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Wednesday, 12 August 2015

कैलाश मानसरोवर यात्रा ---दसवाँ दिन :- गुंजी

 

गुंजी हाई-एल्टीट्यूड में आता है। यहाँ पर हवा का दबाव शरीर को प्रभावित करता है। आगे की यात्रा में ऊचाई क्रमशः बढ़ती जाती है। इसलिए गुंजी में पुनः मेडिकल चेक-अप किया जाता है, इसलिए यात्रीगण यहीं रूकते हैं।


रोज़ की तरह नींद 4 बजे खुल गयी, परन्तु मै आराम से उठा, नित्य कर्मा और स्नान पूजा के बाद 7 बजे तक तैयार हो गया। आज गर्म पानी में नहाकर तृप्ति हुई। 

लगभग आठ बजे सब अपनी-अपनी मेडिकल-फ़ाइल के साथ आकर खड़े हो गए। ’ऊँ नमः शिवाय’ के साथ सभी मंदिर में शीश झुकाते हुए आईटीबीपी के कैंप के प्रांगण में पहुँच गए जहाँ पहले से ही पूरा प्रबंध था। 

कुछ देर बाद आईटीबीपी के मेडिकल ऑफिसर एवं कमान्डेट आए सभी से परिचय प्राप्त कर आगे के यात्रा में आने वाली कठिनाई, समस्या एवं उसके हल करने के उपाय बताए। जिन यात्रियों के द्वारा पोनी पोर्टर की सुविधाएं नही ली गई उनसे कहा गया कि दोनों नही तो कम से कम एक सुविधा अवश्य ही ले भले ही वे उसका उपयोग न करे। यात्रियों को अकेले न चलकर समूह में चलने की सलाह दी गई।  फोटोग्राफी करते समय इस बात का ध्यान रखें कि सेना के कैम्प चाहे वो भारत के हो या चीन के हो फोटो न ले, इस के इलावा इंडिया साइड की  जितनी फोटो ली हैं उस का मेमोरी कार्ड भी ना ले जाने की सलाह दी गई।

पर्यावरण की देखभाल के अंतर्गत उनकी बटालियन ने वहाँ एक ’मानसरोवर-वन की स्थापना की है जहाँ कैलाश-मानसरोवर जाने वाले सभी यात्रियों से एक-एक देवदार का पौधा रोपवाया जाता है। फावड़े से पथरीली ज़मीन खोदकर देवदार का पौधा लगाया और पानी दिया। जवानों से उसकी रक्षा का वचन लिया। ये बाद की बात है सर्दियों में ये पौधे नष्ट हो जाते हैं। 

वापस आ कर हम सभी लोग मेडिकल के लिए अपनी बारी का इंतज़ार करने लगे। तत्पश्चात सभी यात्रियों का वजन एवं ब्लड प्रेशर चेक किया गया, तथा दिल्ली में कराए गए मेडिकल चेकअप की रिपोर्ट देखी गयी। डॉ. ने मेरी रिपोर्ट्स देखीं, ब्लड-प्रैशर हार्ट-बीट इत्यादि चैक की। एक बात और  डॉक्टर सभी यात्रीगणों के साथ बड़े ही दोस्ताना माहौल में मेडिकल चेकउप कर रहे थे।  जिस से यात्रीगणों  में मेडिकल का जो डर था वो दूर हो गया।  यहाँ तक आते आते मेरा वजन 4 किलो कम हो गया था।  मेडिकल चेकअप कराकर वापस कैम्प में आये। मौसम एकदम साफ होने व तेज धूप निकलने की वजह से कैम्प आकर सभी यात्री अपना लगेज खोलकर धूप में सामान एवं कपड़ों को सूखने डाल दिये। मैंने अपना लगेज खोलने पर पाया कि बारिश का पानी अंदर जाने से कुछ गीलापन हो गया है। मैंने भी अपना दोनो लगेज खोलकर धूप में पूरा फैला दिया। 12  बजे खबर आयी कि 1 यात्री मेडिकल में अनफिट हो गए अब उन्हें वापिस दिल्ली जाना होगा। 1.30 बजे सभी यात्रियों के साथ मैंने भी भोजन ग्रहण किया। भोजन के बाद आराम किया गया।  

शाम को घर फोन किया फिर बाहर खड़े सहयात्रियों से बातें करने लगा । कुछ यात्री  इधर-उधर टहलते हुए और प्रकृति के नजारे ले रहे थे। तभी मैं और रघु जी गुंजी गाँव घूमने चले गए।  इतनी ऊंचाई पर  स्टेट बैंक पटियाला बैंक की ब्रांच देख कर मैं बहुत हैरान था।   

अभी फिर से बैग पैक करने थे अब  हमें अपने बैग तकलाकोट में (चीन साइड) मिलने थे। ज़रूरी सामान निकल कर फिर बैग पैक किये। अब तक (गुंजी तक) जो भी कपडे पहने थे वो सभी कपडे एक बैग में रख दिए। अब ये बैग यही गूंजी में छोड़ा जायेगा। 
 
शाम छः बजे सूप पिया और यात्रीगण  कीर्तन-आरती में सम्मिलित होने चले गए।मंदिर कैंप से लगभग सौ-डेढ़ सौ मीटर के फ़ासले पर था। एक छोटा कमरा जिसके अंदर बिल्कुल सामने एक कोठरी मे मूर्तियाँ लगायी हुईं थी।

मंदिर में कुछ जवान और कुछ सहयात्री पहले से ही बैठे थे। हम भी बैठ गए। एक जवान अंदर मूर्तियों के पास पूजा और आरती की तैयारी कर रहा था। जवानों ने ढोलक, मंजीरे, चिमटे और हारमोनियम पर तान छेड़कर बहुत सुंदर भजन सुनाए तो तीर्थयात्रियों ने तालियाँ बजाकर उनका साथ दिया। इस के बाद यात्रियों में नीलम जी, वीरेंदर वर्मा जी ने बहुत ही सुन्दर भजन गाये।  नीलम जी की आवाज बहुत ही प्यारी और मीठी थी और वर्मा जी एक धार्मिक इंसान हैं और भक्ति ज्ञान का भण्डार उन में  कूट कूट कर भरा हुआ है। सुनसान पर्वतों के बीच भक्ति का ऐसा समां बंधा कि कब नौ बज गए पता ही न चला। पूरा मंदिर भरा हुआ था। समापन भगवान शिव और दुर्गा माता की आरती से हुआ। सभी आरती और प्रसाद लेकर वापिस कैंप आगए।

आते ही सीधे सभी भोजन-कक्ष की ओर चले गए। भोजन कक्ष में एलओ ने मींटिंग रखी। उसके बाद अगले दिन की यात्रा के विषय में बताया।
हमने भोजन किया और कल नवींढांग जाने के लिए बिस्तर पर पसर गए।
 
 
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गुंजी कैंप से सुबह अन्नपूर्णा चोटी का दृश्य 




गुंजी कैंप 


जवानों द्वारा चाय की पेशकश 



पौधा लगाने जा रहे यात्रीगण 


पौधा लगाते हुए छैना राम जी, मैं, अंजू जी, नीलम जी

मेडिकल टैस्ट के लिए अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हुए यात्रीगण 
 
कैंप से हेलीकाप्टर की फोटो ली गई 


कपडे धोते हुए 

शाम को गुंजी गाँव से ली गई फोटो 





मंदिर के अंदर 
 

Saturday, 8 August 2015

कैलाश मानसरोवर यात्रा ---नवाँ दिन--बुधी से गुंजी (छियालेख, गर्बियांग)

गुंजी की ऊँचाई 3160 मीटर
 
कुल रास्ता : - 19 कि.मी  पैदल 
समय      : -  7.30 घंटे 

बाकी दिनों की तरह सुबह 4.00 बजे नींद खुल गई। नित्यक्रिया से निवृत हो यात्रा में प्रस्थान के लिए तैयार हुआ। लगभग 5.30 बजे हम सभी ने शिव स्तुति एवं ‘ओम नमः शिवाय का उद्घोष कर सबने आगे की यात्रा के लिए प्रस्थान किया। बुधी से सामने के पर्वत-श्रंखला के साथ अन्नपूर्णा पर्वत और चोटी बड़े ही मनोहारी लग रहे थे।

पथरीली सीढ़ीदार चढ़ाई काफी जोखिम एवं थकाने वाली होती है। और हमे ऐसे ही 3 कि.मी. की चढ़ाई चढ़नी थी। खड़ी चढ़ाई समाप्त होने पर हम लोग छिया लेख के समतल घाटी में पहुच गए। छिया लेख 3350 मी. की उचाई पर है वहां पर हमने नाश्ता किया और चाय पी कर छियालेख के गहरे हरे मैदान को निहारते हुए आगे बढे। घाटी में आगे चेक पोस्ट था जहां पर हम लोगों का पासपोर्ट तथा पोनी पोर्टर का अनुमति पत्र चेक किया गया। अपने पासपोर्ट को दिखा कर, हस्ताक्षर करवा कर हम आगे बढ़ गये। छियालेख घाटी में विभिन्न रंगों के फुल  खिले हुए थे। रंग बिरंगे फूलों के कारण छियालेख को फूलों की घाटी भी कहते हैं।

मैं तेजी से छियालेख घाटी  को पार कर के एल.ओ साहिब से आगे निकला, तभी पीछे से हमारे एल.ओ साहिब ने मुझे आवाज दे कर कहा कहाँ भागे जा रहे हो सुशील, जल्दी पहुँच कर कोई अवार्ड नहीं मिलना प्रकृति को निहारते हुए आराम से जाओ। उन की बात को गाँठ बाँध लिया गया और आस पास के नज़ारे देखते हुए आराम से चला गया। 

यात्रा के 4 कि.मी के बाद पहाड़ी गांव गर्बियांग पहुंचे। जमीन में धंसता यह गांव, अपनी हस्ती को लगातार खो रहा है।  हालांकि, बीती दो सदी में भी कैलास—मानसरोवर के प्राचीन यात्रियों के लिए भी यह गांव बहुत महत्वपूर्ण रहा है। यहीं से वे आगे के सफर के लिए राशन जुटाते थे, पोर्टर का प्रबंध किया करते थे और घोड़े-खच्चरों का इंतज़ाम भी यह गाँव कर देता था। 

यहाँ के घरों के दरवाजे नक्काशीदार थे। बताया गया कि इस गांव से काफी लोग बाहर जाकर पढ़े लिखे हैं जिसमें से कुछ लोग भारतीय प्रशासकीय सेवा में भी है। आगे का रास्ता गार्बियांग बस्ती के बीच से हो कर जाता है। गार्बियांग को धसते हुए गावं के रूप में भी जाना जाता है।

गर्बियांग से गुंजी कैंप 12 कि.मी है। गांव के बाहर आईटीबीपी कैम्प है, जहां सभी यात्री पहुंच कर अपना-अपना पासपोर्ट पुनः चेक करवा रहे थे। इसी समय कैलाश मानसरोवर परिक्रमा पूर्ण कर यात्रियों का दल  (दूसरा दल)वापस वही पर आकर अपना-अपना पासपोर्ट चेक करवा रहे थे। उनसे यात्रा, कठिनाई, मौसम, स्वास्थ्य के बारे में हमारे समुह के यात्रीगण पूछताछ कर रहे थे।

आईटीबीपी कैम्प से आगे बढ़ने पर रास्ते में एक झोपड़ी नुमा एक होटल में दोपहर भोजन की व्यवस्था थी। सभी यात्री वहां पहुंचकर भोजन कर रहे थे। भोजन करने के बाद यात्री क्रमशः रवाना हो रहे थे। चारों और प्रकृतिक सौंदर्य फैला हुआ था। सभी यात्रिओ में प्रकृति के सौंदर्य हो कैमरे में भरने की होड़ से थी।

लगभग दोपहर 1.00 बजे गुंजी कैम्प के पूर्व  दो नदियों का संगम आया। थोड़ी दूर चलने पर सामने आदि कैलाश के दर्शन हो रहे थे। आदि कैलाश भारत में ही है। यहाँ भी लोग दर्शन हेतु और प्रकृति को निहारने जाते हैं। नदी उल्टी दिशा में बहती हुई साथ दे रही थी।नदी के उस पार आईटीबीपी का कैंप गुंजी स्पष्ट दिखाई दे रहा था। थोड़ी देर चलने पर गूंजी ग्राम आ गया और हम  नदी में बने पुल को पार कर  नदी के किनारे चलते हुए ऊपर चढ़ाई करते हुए समतल मैदान में पहुंचे जहा आईटीबीपी का कैम्प है। कैम्प के बाजू में ही कु.म.वि.नि. के द्वारा यात्रियों के लिए कैंप था। हम करीब 1 बजे पहुंचे थे।

गुंजी कैंप बहुत बड़ा है। इस के साथ ही I.T.B.P  का कैंप है। दोनों ओर ठहरने के लिए डोम बने है तो बीच में सुंदर क्यारियाँ। बहुत साफ़-स्वच्छ, हमारा कमरा फाइबर का डोम नहीं था, बल्कि टीन शेड वाला अच्छा-खासा कमरा था जिसके आगे पीछे बरांडे थे, एक पंक्ति में ऐसे ही कमरे थे जिसमें लकड़ी के छः तख्तों पर बिस्तर लगे हुए थे, सामने सब अर्धवृत्ताकर फ़ाइबर के शेड वाले डोम थे।

हमारे दल के जो यात्री पहले पहुँच गए थे वह सब आराम कर रहे थे। मैं भी वहां पहुँच कर बिस्तर पर लेट गया। 
आराम करने के बाद I .T .B .P  का कैंप में घूम कर आये।  गुंजी में जवानों ने एक छोटा सा मंदिर भी बना रखा है। शाम को कुछ यात्री मंदिर में भजन कीर्तन में शामिल होने चले गए।  मैं अपने कैंप में रहा। हमारे कैंप में फ़ोन की भी व्यवस्था थी, लेकिन यहाँ पर कॉल बहुत महंगी थी।  तभी कोचर जी ने मेरे को बताया तुम I.T.B.P के यहाँ से फ़ोन कर लो वहां कॉल बहुत ही सस्ती है। मैं और कोचर जी ने वहां जा कर घर फ़ोन किया।   

गुंजी पहुँचकर सभी यात्री रिलेक्स्ड महसूस रहे थे, क्योंकि कल भी पूरे दिन यहीं रुकना था। रात को भोजन-कक्ष में एल.ओ साहिब ने  सभी से अपनी-अपनी मेडिकल-जाँच रिपोर्ट की फ़ाइल(जो दिल्ली में अस्पताल से मिली थी) बाहर रखने और सुबह नाश्ता करके अपने अपने ग्रुपके साथ आई.टी.बी.पी. के प्रांगण में चलने के लिए तैयार रहने को कहा।  इस के बाद सब यात्री  खाना खाने लगे।  भोजन बहुत ही स्वादिष्ट था। सभी ने कु.म.वि.नि. के कर्मचारियों की प्रशंसा की और धन्यवाद दिया। सच में बहुत ही स्नेह और आदर  के साथ वे लोग खाना खिलाते और सेवा करते थे। हम हमेशा उनके आभारी रहेंगे।


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गुंजी कैंप में एक छोटे से मंदिर के बाहर लगा भोले बाबा का त्रिशूल 
बुधी से चलते हुए सुबह के समय 


छियालेख तक ऐसा ही रास्ता है 


रास्ते के सुंदर दृश्य 



छियालेख में हमारे एल.ओ


छियालेख की सुन्दरता 



छियालेख घाटी को पार करते हुए 




मनोहर दृश्य 


गर्बियांग गाँव से गुजरते हुए 




सामने होटल में हमारे दोपहर के भोजन का प्रबन्ध था। 



दोपहर का भोजन करते हुए यात्रीगण 




दो नदियों का संगम 


नदी के दूसरी तरफ गुंजी कैंप का दृश्य 


आदि कैलाश ज़ूम कर  लिया गया फोटो 


दूर सामने आदि कैलाश के दर्शन 


गूंजी ग्राम के पुल को पर करते ही मनोरम दृश्य 



 

Monday, 3 August 2015

कैलाश मानसरोवर यात्रा =आठवाँ दिन- गाला से बुधी (बिन्दाकोटी, लखनपुर, मालपा, लामरी) =19 KM Trek

 
बुद्धि की ऊँचाई 2740 मीटर

आज की यात्रा लगभग 18-19 कि.मी के लगभग थी, जो बहुत ही कठिन थी। आज की इस यात्रा में क्या क्या सावधानी रखनी हैं इस के  बारे में हमें बार बार बताया गया था। साथ में ये भी बताया गया था अगर आप चलते चलते काली नदी में गिर जाते हो तो आप की बॉडी को सर्च नहीं किया जायेगा तीन दिन बाद डेथ सर्टिफिकेट जारी कर दिया जायेगा जिस का कारण है काली नदी का तीव्र बेग। चलो शुरू करते हैं आज की यात्रा। 

अब सुबह 4 बजे नींद खुलने का नियम सा बन गया था। नित्यक्रिया से निवृत हो स्नान ध्यान किया। फिर जा कर  चाय पी। ठीक 5 बजे यात्रा पर रवाना हुए। चलने से पहले ही मेरा पोर्टर राजिंदर आ गया उस ने मेरा बैग उठा लिया और हम साथ साथ चलने लगे।
 
अत्यन्त कठिन संकरा एवं पथरीला रास्ता था। सब से बड़ी मुश्किल थी, रास्ते में ध्यान से चलें या आस पास की प्रकृतिक सुंदरता को देखें? दाहिने तरफ 300-400 फीट नीचे काली नदी अत्यन्त वेग से बह रही थी।  उस पर विपरीत दिशा से आते हुए घोड़े और खच्चर। जो यात्री पैदल नहीं जा रहे थे वो अपने अपने घोड़े पर बैठ कर आगे जा रहे थे। थोड़ी देर चलने के बाद  छोटा सा मंदिर आया और हम माथा टेक कर आगे बढ़ गए।

बिन्द्कोटी से शुरू हुई  4444  सीढ़ियाँ की उतराई का सफर, ये सीढ़ियाँ क्या मानों पत्थरों को फेंक-फेंककर बनायी हुई सीढ़ियाँ हों। देखने में तो उबड़-खाबड़ टेढ़े-मेढ़े, छोटे-बड़े पत्थर बेतरतीब पड़े थे। पत्थर पर पैर रखते हुए कभी-कभी संतुलन नहीं बनता था। इन सीढ़ियों पर कोई भी यात्री घोड़े पर नहीं चढ़ा था। कई यात्री अपने पोर्टर का हाथ पकड़ कर नीचे उतर रहे थे।  मैं यहाँ वीडियो बनाते हुए नीचे उतर रहा था अचानक मेरा पैर फिसल गया, लेकिन मैं गिरने से बच गया। तभी मन ही मन सोचा 'सुशील क्या कर रहा है ?यात्रा के जिस दिन के बारे में  सावधानी बरतने के लिए  बार बार बताया गया वही गलती क्यों कर रहा है। .इस के बाद पूरी सावधानी से चला गया। सीढ़ियाँ उतरते-उतरते घुटने जवाब देने लगे थे।  बस छोटे से  रास्ते पर आंखें गढ़ाए चलते जा रहे थे अपनी बेंत के सहारे।
 
लगभग 8 बजे के करीब हम लोग लखनपुर पहुंचे, वहां चाय नाश्ते  की व्यवस्था की गई थी। यात्री अपनी चाल के अनुसार आ रहे थे और चाय पीकर, नाश्ता  कर पुनः आगे बढ़ रहे थे। आगे पहाड़ों पर सारे रास्ते में छोटे छोटे से बहुत सुन्दर संदेश  लिखे हुए थे। आगे बढ़ने पर आया एक लकड़ी का पुल जिसके नीचे तीव्र  गति के समान  गिरता झरना जिसके छींटें पुल के ऊपर भी आ रहे थे दूसरी ओर से आती काली नदी का पानी पुल के नीचे मिल रहा था।

लगभग 10.30 बजे हम लोग माल्पा (2018 मीटर) पहुचे, जिसके बारे में बताया गया कि 1998 के पूर्व तक यात्री यही पर रात्रि विश्राम करते थे किंतु 1998 में रात्रि के वक्त पहाड़ धसने से यात्रियों सहित 200-300 लोगो की मृत्यु हो गई थी, तब से यहां से कैम्प हटा दिया गया है। रास्ते मे ही 1998 के दुर्घटना में मृत लोगों के (यात्री, जवान अन्य) याद में ‘‘स्मृति स्‍तंभ‘‘ बनाया गया है। जिसमे म.प्र. के पूर्व मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह के द्वारा निर्माण कार्य में सहयोग करना भी उल्लेखित है।
 
मालपा में ही कुमाऊ मण्डल विकास निगम के द्वारा यात्रियों के दोपहर भोजन की व्यवस्था की गई। छोटी सी चारदीवारी से घिरे आंगन में चारों ओर बैठने के लिए सीमेंट की मुंडेर सी बनी थीं जिन पर दरी बिछी हुई  थी। बीच में छोटी सी मेज पर परात में सब्जियाँ थी। क्रमशः यात्रीगण आते जा रहे थे और भोजन ग्रहण कर रहे थे।  5 कि.मी आगे लामरी गाँव था। 

आगे का रास्ता पीछे के रास्ते के मुकाबले अपेक्षाकृत आसान था। लगभग 1 बजे मैं लामरी पहुंचा। यहां पर इण्डो-तिब्बत बार्डर पुलिस के कैम्प में यात्रियों के लिए बिस्किट, आलू, चिप्स व चाय की व्यवस्था की गई थी । जवानों के द्वारा ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ बोलकर यात्रियों का स्वागत करते हुए उन्हें बिठाया जा रहा था एवं चाय प्रस्तुत की जा रही थी। मैंने चाय और चिप्स लिए और  चलने से पहले उनका आभार प्रकट किया।

लामरी से आगे के रास्ते में बहुत ही खूबसूरत झरने  देखने को मिले थोड़ा आगे बढ़ने पर बायीं ओर पहाड़ों के ऊपर एक बहुत ही सुन्दर झरना गिरते हुए आकर्षित कर रहा था। तो दूसरी  तरफ काली नदी घाटी में तेजी से  बह रही थी। कुछ समय हमने यहाँ फोटो लिए और आगे चल दिए। रास्ता पथरीला सकरा एवं घाटी होने से बहुत रिस्की भी था। आगे रास्ते मे तेज बहाव वाला झरना मिला जिसमें बीच-बीच मे बेढ़ंगे पत्थर थे तथा नीचे गहरी खाई में काली नदी बह रही थी।

लामरी  से बुधी कैंप की दूरी 4 कि.मी है। लामरी से २ कि.मी आगे जाने पर थकावट हावी होने लगी। आखिरी के 2 कि.मी बड़ी मुश्किल से पार हुए।  हम पुल पार कर एक दम खड़ी चढ़ाई पार कर बुधी पहुंचे। बुधी छोटा सा पहाड़ी गांव है। गांव के पास ही कुमाऊ मंडल विकास निगम का कैम्प है।  कैंप के बाहर फूलो की लम्बी कतार देख कर दिल में अजीब सा सुकून मिला। बुधी कैंप थोड़ा नीचे को बना है। प्रवेश में ही कुछ सीढ़ियाँ उतरनी पड़ती हैं। थकान पूरी तरह से हावी थी।
 
कैंप में स्वागत ’ऊं नमः शिवाय’के उद्घोष और  शरबत के साथ हुआ। हम लोग 3 बजे तक कैंप पहुंच गये थे। कैंप में पहुँचते ही मैं बिस्तर पर गिर पड़ा।  आज मैंने 18 -19 कि.मी की दूरी 10 घंटे तय की थी। थोड़ी देर आराम करने के बाद चाय आ गये। कुछ यात्री अभी पीछे रह गए थे। काफी देर बाद वे  यात्री पहुंचे नहीं।  एल.ओ साहिब चिंतित थे उनके बारे में।  थोड़ी देर में सभी यात्री सकुशल कैंप में आ गए।  सभी यात्रियों के आने के बाद एल.ओ साहिब को मिनिस्ट्री ऑफ़ एक्सटर्नल अफेयर को सूचित करना होता है और पहुँचने के टाइम के बारे में बताना होता है।  बाद में इस सुचना के आधार पर K.M.V.N वाले उसे अपनी साइट पर अपडेट करते हैं।  
 
शाम को मौसम बहुत ही अच्छा था। कैंप में लगे फूलों की फोटो ली गई।  कैंप में ही सॅटॅलाइट फ़ोन PCO था, तो वह फ़ोन करने चला गया। कैंप में मैंने अपना ब्लड प्रेशर डॉक्टर से चेक करवाया और मुझे आज ही पता चला K.M.V.N की तरफ से एक डॉक्टर साहिब हमारे साथ साथ धारचूला से चल रहे हैं।  वही पर एक गाँव वाले से मेरी मुलाकात हुई जिस ने एक कीड़ा दिखाया जिसे कीड़ा जड़ी कहते हैं।  मेरे पोर्टर ने भी रास्ते में इस कीड़ा जड़ी के बारे में बताया था।  कीड़ा जड़ी के बारे में आप भी सुन कर हैरान रह जायेगें। 

कीड़ा जड़ी के बारे में 

कीड़ा... जड़ी हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ पिघलने के बाद उत्तराखंड और हिमाचल के कबायली इलाकों में मिलने वाली एक दुर्लभ बूटी है। कीड़ा जड़ी कहे जाने वाली यह बूटी साधारण नहीं है। इस बूटी की चीन जैसे देशों में खासी डिमांड है, क्योंकि इस बूटी से सेक्स पावर बढ़ाने वाली वियाग्रा तैयार की जाती है। अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में सूखी हुए इस बूटी की कीमत करीब 60 लाख रुपए प्रतिकिलो है। जबकि दिल्ली में इस बूटी की कीमत करीब 10 लाख रुपए प्रतिकिलो  है। कीड़ा जड़ी एक तरह की फफूंद है जो हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में पाई जाती है। यह एक कीड़े पर हमला करती है, और उसे चारों तरफ से अपने आप में लपेट लेती है। उत्तर भारत में इसे जहां कीड़ा जड़ी कहा जाता है, वहीं तिब्बत में इसे यारसागुम्बा के नाम से जानी जाती है। चीन में कीड़ा जड़ी को वासनोत्तेजक मेडिसिन के तौर पर प्रयोग किया जाता है। हालांकि इसका कारोबार कानूनन जुर्म है। नेपाल में इस बूटी का कारोबार कभी वैध था और लम्बे समय तक यहां से यह बूटी वैध रूप से बेची जाती थी। बाद में इस पर नेपाल सरकार ने भी प्रतिबंध लगा दिया था। कई लोग इसे पाने के लिए अवैध रूप से ग्लेशियर को पिघला रहे हैं। 

रात्रि को गर्म सूप पिया गया और बाद में रात का खाना के टाइम पर आगे के यात्रा के बारे में एल .ओ. ने ब्रीफिंग की। खाना खा कर सभी यात्री निद्रा की गोद में चले गए। 
 
 
 
सुबह चलते हुए 

रास्ते में छोटा सा मंदिर 


मेरा  पोर्टर राजिंदर (नकली नाम )

4444 सीढ़ियां उतरते हुए 

सीडियां उतरते हुए 




यात्रा का आनंद मानते हुए 



काली नदी के दूसरी तरफ नेपाल साइड में झरना 

लखनपुर

लखनपुर में यात्री नाश्ता करते हुए 

सारे रास्ते ऐसे सन्देश ही लिखे हुए हैं। 

काली नदी 




रौद्र रूप काली नदी का 


मालपा गाँव से पहले लकड़ी का पूल 

मालपा गाँव 


मालपा में दोपहर के खाने का इंतजाम 


झरना 

लामरी में जवान  चाय के साथ यात्रियों  स्वागत करते हुए 

मनमोहक झरना 


बुधि कैंप 


कीड़ा ---जड़ी