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Saturday, 24 October 2015

कैलाश मानसरोवर यात्रा ----चौबीसवाँ दिन-----पिथौरागढ़ से जागेश्वर

पिथौरागढ़ से जागेश्वर
 
आज हम 7.30 बजे  शिव स्तुति के बाद जागेश्वर के लिए रवाना हुए। बस गोल-गोल रास्तों पर घूम रही थी। लगभग 2 घंटे के बाद भूस्खलन की वजह से रास्ता बंद मिला। सब यात्रियों ने मिल कर पत्थर को हटाया। थोड़ा सा आगे जाने पर पुन: भारी भूस्खलन मिला। उत्तराखंड सरकार के बुलडोजर और जेसीबी मशीन मलबे को हटाने में लगी हुई थी। परन्तु जितने मलबे को वो हटाते उतना ही नया मलबा पहाड़ से नीचे आ जाता। हम सब ने वही पास की दुकान से चाय - पकोड़े खाए। यहाँ करीब 5 घंटे रुकने के बाद हम आगे बढ़े। 

एक बात का जिक्र जरूर यहाँ करना चाहूंगा। इस तीर्थ यात्रा में तीन तरह के यात्री थे। एक जो इस यात्रा को रोमांच, ट्रैकिंग और पर्यटन के रूप में ले रहे थे। दूसरा वे यात्री थे जो पूर्ण रूप से धार्मिक और अध्यातिमिक थे। तीसरा वे यात्री थे जो पर्यटन के आनंद के साथ धार्मिक स्थान की यात्रा का पुण्य भी लेना चाहते थे।

जाम में एक बात और हो गई। पहली तरह के कुछ यात्री जागेश्वर की जगह काठगोदाम जाना चाहते थे। जिस से वो अगले दिन दिल्ली  जल्दी पहुँच सके। लेकिन कुछ यात्री जागेश्वर ही जाना चाहते थे। हमारे एल.ओ साहिब ने भी काठगोदाम जाने के लिए बोल दिया। यात्रियों ने जब एल.ओ. साहिब को कहा कि हमें पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार जागेश्वर ही जाना चाहिए, पर एल.ओ. साहिब नहीं माने। जागेश्वर का रास्ता मात्र 2 घंटे का था और काठगोदाम पहुँचने में 5 - 6 घंटे का समय लगना था। फिर जो यात्री जागेश्वर जाना चाहते थे, उन्होंने एल.ओ से कहा कि हम रात को पहाड़ी सफर नहीं करेंगे यदि वह फिर भी नही मानेगें तो वो वही उतर कर टैक्सी ले कर जागेश्वर जा कर फिर दिल्ली जायेगें। एल.ओ. साहिब ने इस के बाद जागेश्वर के लिए हाँ कर दी।

शाम 5.30  बजे हमारी बस जागेश्वर पहुंची। उस समय बारिश हो रही थी। हम अपना बैग उठाकर नीचे उतरे तो घुटने बिलकुल जाम हो गए थे। थकान से शरीर निढ़ाल हो रहा था। गेस्ट-हाऊस के रिसेप्शन पर ही K.M.V.N  की ओर से ऊनी वस्त्रों की बिक्री हो रही थी। रूम में पहुंच कर सामान रख कर  हम जागेश्वर मंदिर जाने के लिए तैयार हो गए। बाहर बहुत ही तेज बारिश हो रही थी।  हम ने छाता उठाया और आरती से पहले ही मंदिर पहुँच गए। मंदिर में छोटे बड़े  बहुत से देवालय बने हुए हैं।। सभी के अलग-अलग पुजारी हैं। मुख्य मंदिर पर दारुकवन ज्योतिर्लिंग लिखा था। मैं और वर्मा जी ने  मंदिर में बैठ कर भोले बाबा का ध्यान किया। वही पर वर्मा जी ने भजनों द्वारा बहुत ही सुन्दर समां बांधा। बाद में हम सभी ने आरती का पूर्ण रूप से आनंद लिया।  बाहर अभी भी पूरी तरह से बारिश हो रही थी। जिस कारण हम सभी मंदिरों के दर्शन नहीं कर सके। सही कहूँ मन तृप्त नहीं हुआ था, यहाँ आ कर एक तो हम लेट पहुंचे थे यहाँ पर, दूसरा बारिश और अंधेरे की वजह से जागेश्वर धाम के दर्शन अच्छी तरह से नहीं कर सके। फिर कभी यहाँ आ कर अच्छे से दर्शन करेंगें इस जगह के ये सोच कर मन को समझाया।  

मंदिर से वापिस गेस्ट-हाऊस आये। रात्रि का भोजन कर सोने चले गए।

जागेश्वर धाम के बारे में

 

उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 37 किलोमीटर दूर स्थित केंद्र जागेश्वर धाम के प्राचीन मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस क्षेत्र को सदियों से आध्यात्मिक जीवंतता प्रदान कर रहे हैं। यह समुद्र तल से 1870 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।  जागेश्वर मंदिर विशेष रूप से सुंदर देवदार के पेड़ों के बीच भगवान शिव को समर्पित है। जागेश्वर को पुराणों में हाटकेश्वरऔर भू-राजस्व लेखा में पट्टी पारूणके नाम से जाना जाता है। पतित पावन जटागंगाके तट पर समुद्रतल से लगभग पांच हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित पवित्र जागेश्वर की नैसर्गिक सुंदरता अतुलनीय है। कुदरत ने इस स्थल पर अपने अनमोल खजाने से खूबसूरती जी भर कर लुटाई है। लोक विश्वास और लिंग पुराण के अनुसार जागेश्वर संसार के पालनहार भगवान विष्णु द्वारा स्थापित बारह ज्योतिर्लिगों में से एक है।
 
उत्तर भारत में गुप्त साम्राज्य के दौरान हिमालय की पहाडियों के कुमाऊं क्षेत्र में कत्यूरीराजा थे। जागेश्वर मंदिरों का निर्माण भी उसी काल में हुआ। इसी कारण मंदिरों में गुप्त साम्राज्य की झलक भी दिखलाई पडती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार इन मंदिरों के निर्माण की अवधि को तीन कालों में बांटा गया है। कत्यरीकाल, उत्तर कत्यूरीकाल एवं चंद्र काल। बर्फानी आंचल पर बसे हुए कुमाऊं के इन साहसी राजाओं ने अपनी अनूठी कृतियों से देवदार के घने जंगल के मध्य बसे जागेश्वर में ही नहीं वरन् पूरे अल्मोडा जिले में चार सौ से अधिक मंदिरों का निर्माण किया जिसमें से जागेश्वर में ही लगभग 250  छोटे-बडे मंदिर हैं। मंदिरों का निर्माण लकडी तथा सीमेंट की जगह पत्थर की बडी-बडी शिलाओं से किया गया है। दरवाजों की चौखटें देवी देवताओं की प्रतिमाओं से अलंकृत हैं। मंदिरों के निर्माण में तांबे की चादरों और देवदार की लकडी का भी प्रयोग किया गया है। पुराणों के अनुसार शिवजी तथा सप्तऋषियोंने यहां तपस्या की थी। कहा जाता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई मन्नतें उसी रूप में स्वीकार हो जाती थीं जिसका भारी दुरुपयोग हो रहा था। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य जागेश्वर आए और उन्होंने महामृत्युंजयमें स्थापित शिवलिंगको कीलित करके इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। शंकराचार्य जी द्वारा कीलित किए जाने के बाद से अब यहां दूसरों के लिए बुरी कामना करने वालों की मनोकामनाएंपूरी नहीं होती केवल यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएंही पूरी हो सकती हैं।
सुबह सुबह पिथौरागढ़ से निकलते हुए 
 
चलती बस से खींचा गया फोटो 
चलती बस से खींचा गया फोटो 
यात्रीगण पत्थर हटाते हुए 
फिर से भूस्खलन 
जागेश्वर मंदिर 
 


5 comments:

  1. We had all kind of experiences with nature. The natural calamity on our return course was also a good exposure. It also gave the opportunity to see changes in ourselves on the face of adversities.

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  2. we were blessed with all round exposure without any much trouble nice trip ....Om namah Sivay...

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  3. Wow Man! I started reading and then read all posts. Whole story is captivating. I felt like it was I who did the journey.

    Thanks and keep writing. I will be waiting for your next posts.

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  4. Thank you parveen ji for your appreciation and blessing.

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