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Monday, 17 August 2015

कैलाश मानसरोवर यात्रा ---ग्यारहवाँ दिन :- गुंजी से कालापानी, नवींढांग(ऊँ पर्वत)


कालापानी की ऊँचाई 3600 मीटर,
नवींढांग की ऊँचाई 4250 मीटर
 
कुल रास्ता : - 19 कि.मी  पैदल 
समय       : - 10.30 घंटे लगभग 

सुबह 3.30 बजे नींद खुल गई। नित्य कर्मा से निवृत होकर मैंने स्नान किया और जल्दी से तैयार होकर, चाय पी कर 5.15 बजे कालापानी के लिए निकल गया। मंदिर में शीश झुकाकर और वंदना करके सभी भोले के नाम का जयकारा लगाकर जवानों के साथ चल दिए। गंुजी से चीन सीमा तक यात्रियों के साथ आगे-पीछे एवं बीच में आईटीबीपी के जवान चलेंगें। जवानों ने इमरजेंसी के लिये साथ में आक्सीजन सिलेंडर भी रखे हुए थे। 

जैसे-जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे, हरियाली कम होते जा रही थी। केवल पत्थर, चट्टान ही दिखाई दे रहा था। प्राकृतिक धरोहर को आँखों में भरते हुए काली नदी के किनारे-किनारे आगे बढ़ते  जा रहे थे। लगभग ३ घंटे चलने की बाद हम काली नदी के उदगम स्रोत पर बने कालीमाता के मंदिर पर पहुँच गए। काली नदी में बने पुल से नदी पारकर कालापानी पहुंचे। सरोवर के किनारे रास्ते पर चारों ओर रंगीन पेपर की झंडियाँ लगायी हुयीं थीं। छोटे-छोटे पत्थरों को लाल रंगकर उनसे सरोवर के जल में ऊँ लिखा हुआ था।

काली नदी के बारे में

काली नदी भारत के उत्तराखंड राज्य में बहने वाली एक नदी है। इस नदी का उद्गम स्थान हिमालय में 3600  मीटर की ऊँचाई पर स्थित कालापानी नामक स्थान पर है, जो उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ जिले में है। इस नदी का नाम काली माता के नाम पर पड़ा जिनका मंदिर कालापानी में लिपु-लीख दर्रे के निकट भारत और तिब्बत की सीमा पर स्थित है। अपने उपरी मार्ग पर यह नदी नेपाल के साथ भारत की निरंतर पूर्वी सीमा बनाती है। यह नदी उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों में पहुँचने पर शारदा नदी के नाम से भी जानी जाती है।
काली नदी जौल्जिबि नामक स्थान पर गोरी नदी से मिलती है। यह स्थान एक वार्षिक उत्सव के लिए जाना जाता है। आगे चलकर यह नदी, कर्नाली नदी से मिलती है और बहराइच जिले में पहुँचने पर इसे एक नया नाम मिलता है, सरयु और आगे चलकर यह गंगा नदी में मिल जाती है। पंचेश्वर के आसपास के क्षेत्र को 'काली कुमाँऊ' कहा जाता है। सिंचाई और पन-विद्युत ऊर्जा के लिए बनाया जा रहा पंचेश्वर बांध, जो नेपाल के साथ एक संयुक्त उद्यम है, शीघ्र ही सरयू या काली नदी पर बनाया जाएगा। काली नदी भारत और नेपाल की सीमा रेखा बनकर दोनों को पृथक करती है। 
 

मंदिर के सामने एक पहाड़ में बहुत ऊँचाई पर एक गुफ़ा थी। जहां पर आईटीबीपी द्वारा पहचान हेतु झण्डा भी लगाया गया है। उक्त सुराख को ‘‘व्यास गुफा” बताया गया। इसी गुफा में महामुनि ब्यास  द्वारा वर्षों तपस्या की गयी है।

ऊँचे-ऊँचे पर्वत शिखरों से घिरे काली मंदिर में भजनों का संगीत बज रहा था। मंदिर में आईटीबीपी के जवानों द्वारा आलू चिप्स एवं चाय की व्यवस्था की गई थी। यात्रीगण वहां पहुंचते जा रहे थे एवं चिप्स के साथ चाय का आनन्द ले रहे थे।

हम सभी ने जूते उतारकर हाथ-मुंह धोकर अंदर प्रवेश किया। एक बड़े से कमरे में सामने दो छोटे कक्ष थे जिनमें एक में माँ काली की प्रतिमा विद्यमान थी तो दूसरे में भगवान शंकर जी की। मंदिर को सलीके से सजाया हुआ था। रंगीन कालीन बिछा हुआ था। ढोलक मंजीरे और चिमटा इत्यादि रखे हुए थे जिनसे पता चलता था कि यहाँ भी कीर्तन होता रहता है। देखकर मन मंत्र-मुग्ध हो गया। मंदिर के बाहर बड़ा सा कुण्ड बना हुआ है जिसमें मंदिर के अन्दर से पानी बहता हुआ आकर एकत्र होता है। फिर वही पानी बहते हुए आगे जाकर नदी में मिल जाता है यहां से यह नदी कालीनदी कहलाती है। बाहर एक अन्य कक्ष में हनुमानजी की प्रतिमा थी। लगभग एक घंटा हम ने यहाँ बिताया। 


 

यह जगह इतनी सुन्दर थी कि यहाँ से जाने का दिल नहीं कर रहा था। 

शनिवार के दिन काली माता के दर्शन कर, प्रसाद ग्रहण कर इमीग्रेशन के लिए प्रस्थान किया और फॉर्म भर कर, पासपोर्ट पर इमीग्रेशन करवा कर, कालापानी कैंप में आये। जहा बुरसँ के फूलो का शरबत ताज़गी देने के लिए तैयार थे। यही पर हम लोगो ने नाश्ता किया और थोड़े विश्राम के बाद नवींढांग के लिए प्रस्थान किया।

आगे का वातावरण ठंडा होने लगा था, कालापानी से नबीढ़ांग की दूरी 9 कि.मी है। नवीढांग के रास्ते में हरियाली कम दिखी किन्तु घाटी में रंग-बिरंगी फूल जरूर दिखे। ऊँ पर्वत के दर्शनों का लोभ लिए सभी जल्दी से जल्दी नवींढांग पहुचना चाह रहे थे। नवीढ़ांग के रास्ते में लगभग चारों तरफ पहाड़ी चोटी दिखलाई दे रही थी। जिसके आसपास काफी कोहरा भी था। लगभग 3.30 बजे मैं ‘‘नवीढ़ांग” पहुंच गया।
यहाँ पर मौसम साफ़ नहीं था।  ऊँ पर्वत  बादलों में छिपा हुआ था।  

हम  टकटकी लगाये ऊँ पर्वत के पूरे दर्शनों के अभिलाषा लिए बैठे रहे परन्तु सिर्फ थोड़े से  दर्शन हुए और शाम को वह भी खत्म हो गये।   
 
सात बजे रात का खाना लग गया क्योंकि अगले दिन की यात्रा बहुत कठिन थी और अगले दिन सुबह दो बजे प्रस्थान करना था इसलिए रात को जल्दी सोना था। कल  लिपुलेख पास पार करके तिब्बत में प्रवेश करना था। लिपुलेख का मौसम बहुत थोड़ी देर सुबह लगभग सात बजे (दो/तीन घंटे) तक ही ठीक रहता है। उसके बाद वहाँ बर्फीली आंधियाँ और बारिश होने लगती है। यात्रियों को निर्धारित समय-सीमा के अंदर ही लिपुलेख पास पार करना पड़ता है।  भोजन से पहले एलओ ने छोटी सी मीटिंग की। अगली सुबह सभी से कई लेअर्स में कपड़े पहनकर सिर से पैर तक ढकने और रैनकोट, टॉर्च और ड्राई-फ्रूट्स साथ रखने के लिए कहा। पोनी पर चलने वालों को ठंड से बचने के लिए विशेष ध्यान देने के लिए कहा क्योंकि पैदल चलने वाले यात्रियों को चलने से गर्मी आ जाती है पर पोनी पर हवा बहुत लगती है।
 
चीनी अधिकारियों द्वारा 7.30 बजे भारतीय समय के अनुसार (चीन का समय हम से 2.30 घंटे आगे है।) सुबह सीमा पार कराने का समय निश्चित किया गया है। इसलिए समय का ध्यान रखते हुए कल पैदल यात्री 2.00 बजे (रात के) तथा घोड़े वाले यात्री 3.00 बजे (रात को)अपनी-अपनी यात्रा प्रारंभ करेंगे तद्नुसार यात्री तैयार रहें। यहाँ पर मैंने अपने कैमरे का मेमोरी कार्ड निकाल लिया और दूसरा नया मेमोरी कार्ड डाल दिया। ऐसा सिर्फ गुंजी में दी गई चेतावनी की वजह से किया गया।  अगले दिन के रोमांच को मन में रखकर हम जल्दी सो गए।





अगली  पोस्ट में इंडियन - चाइना बॉर्डर पार करेगें 

इस यात्रा को आरम्भ से पढने के लिये यहाँ क्लिक करें।


  

गुंजी में 










काली माता मंदिर 


ब्यास गुफा ज़ूम कर के खींचा गया फोटो 

दूर ब्यास गुफा 



काली माता मंदिर 

काली माता मंदिर के अंदर का दृश्य 


भोले बाबा 


माँ काली 







नवींढांग जाते हुए 

पांडव पर्वत 

 रास्ते में रंग बिरंगे फूल 





नवींढांग में ओम पर्वत 

नवींढांग में छोटा सा मंदिर 
 
नवींढांग

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