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Tuesday, 8 September 2015

कैलाश मानसरोवर यात्रा ----चौदहवाँ दिन - तकलाकोट से दारचेन


दारचेन की ऊँचाई - 4670 मीटर

 

कुल रास्ता : - 130 कि.मी  बस से 
समय      : -  7.30 घंटे 
 
आज 5 बजे सुबह उठकर तैयार हुए। 6 बजे नाश्ता के लिए डायनिंग हॉल गए। चाबी हम लोगो ने काउंटर पे जमा कर दी। शिव स्तुति और जयकारे के बाद हम सभी 7 बजे बस में चढ़ गये । सभी को खिड़की वाली सीट चाहिए थी।  कोचर जी और वर्मा जी ने मेरे लिए पहले से ही  ड्राइवर के बिल्कुल पीछे वाली सीट बुक कर दी थी। तिब्बत में ड्राइवर की सीट बायीं ओर होती है जबकि हमारे यहाँ दायीं ओर। बस आरामदायक थी।

यह फोटो होटल के फोटो फ्रेम से खींचा गया है। 
 
बस तकलाकोट से निकलकर खेतों और करनाली नदी के किनारे पहाड़ी रास्तो की चढाई चढ़ते हुए चल रही थी। सड़क पक्की थी और ट्रैफिक बहुत कम था। कभी कभी कोई गाड़ी दिख जाते थी। निर्जन, वीरान एवं बंजर भूमि हल्की पहाड़ी तथा सपाट मैदान से होकर हमारी बस जा रही थी। दूर-दूर तक हरियाली नजर नही आ रही थी। तिब्बत के पठार का नज़ारा कम सुंदर नहीं था। ऊपर सफ़ेद बर्फ़ से ढ़की चोटियाँ तो नीचे मटमैले पठारों की चोटियों हम तिब्बत की प्राकृति को निहारते चले जा रहे थे। निर्जन सड़क पर चलते-चलते कभी-कभी भेड़ों के झुंड मिल जाते थे। ड्राइवर ने बस में चीनी गीत बजा रखे थे, जिनके बोल हमें बिलकुल समझ नहीं आ रहे थे पर संगीत की मधुरता तो सचमुच डुबोने वाली थी। पीछे कुछ यात्री स्वयं भी कीर्तन कर रहे थे।

लगभग 8.30  बजे हमारी बस एवं जीप एक बड़ी सी झील के किनारे जाकर रूक गई । गुरु ने सभी से नीचे उतरने का आग्रह किया। हम सभी यात्री नीचे उतरे, बस से नीचे उतरते ही तेज ठण्डी हवा महसूस हुई। झील काफी नीचे थी। इस झील का नाम राक्षसताल बताया गया, जैसे ही हम ने झील को देखा तो  झील नीलमणि सी चमकती कोई चीज लग रही थी। उसका सौंदर्य मूक कर रहा था। हम देख रहे थे पर शब्द न सूझ रहे थे। हम सभी यात्री इस सुन्दर झील के फोटो खीचने में मग्न हो गए। मेरे ख्याल से  निर्मल नील नीर वाली राक्षस-ताल का सौंदर्य शायद दुनिया की सुंदरतम झीलों में आँका जाता होगा। वहाँ कहीं-कहीं पुराने कपड़े भी पड़े थे, शायद लामा लोग या बौद्ध तीर्थयात्री फेंक जाते होंगे।
 
 
मान्यता है कि रावण द्वारा इसी झील के किनारे बैठकर भगवान शिव की कठिन तपस्या किया गया है। इसलिए इस झील को ‘‘रावण ताल” या “राक्षसताल” भी कहते हैं। रावण के कारण राक्षस-ताल अभिशप्त मानी गयी है। किंवदंतियों में इसके जल को विषैला बताया गया है, इसलिए इसके जल का स्पर्श वर्जित माना गया है। पक्षी भी इस का जल नहीं पीते और ना ही इस झील में कोई जीव जन्तु निवास करते हैं। 

राक्षसताल झील के बारे में

राक्षसताल तिब्बत में एक झील है जो मानसरोवर और कैलाश पर्वत के पास, उनसे पश्चिम में स्थित है। सतलुज नदी राक्षसतल के उत्तरी छोर से शुरु होती है। पवित्र मानसरोवर और कैलाश के इतना पास होने के बावजूद राक्षसताल हिन्दुओं और बौद्ध-धर्मियों द्वारा पवित्र या पूजनीय नहीं मानी जाती। इसे तिब्बती भाषा में लग्नगर त्सो (ལག་ངར་མཚོ།) कहते हैं। प्रशासनिक रूप से यह तिब्बत के न्गारी विभाग में भारत की सीमा के पास स्थित है।राक्षस ताल लगभग 225 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र, 84 किलोमीटर परिधि तथा 150 फुट गहरे में फैला है। इस झील के तट पर राक्षसों के राजा रावण ने शिव की आराधना की थी। इसलिए इसे राक्षस ताल या रावणहृद भी कहते हैं। एक छोटी नदी गंगा-चू दोनों झीलों को जोड़ती है। जहाँ मानसरोवर का पानी मीठा है, वहाँ राक्षस ताल का खारा है। मानसरोवर में मछलियों और जलीय पौधों की भरमार है, जबकि राक्षस ताल के खारे पानी में यह नहीं पनप पाते। स्थानीय तिब्बती लोग इसके पानी को विषेला मानते हैं। मानसरोवर गोल है और इसे सूरज का और दिन की रौशनी का प्रतीक माना जाता है जबकि राक्षसताल के आकार की तुलना अर्धचंद्र से की जाती है और इसे रात्रि का और अंधेरे का प्रतीक माना जाता है। 

यहाँ से कैलाश पर्वत के पहले दर्शन होते हैं, परन्तु बादलों में छुपे होने के कारण हमें दर्शन का सुख प्राप्त नहीं हुआ था। एक घंटा राक्षस ताल पर बिताने के बाद हमारी बस चल पड़ी और थोड़ी देर में बस मानसरोवर झील के किनारे जा कर रुकी। मानसरोवर के पानी में सूरज की किरणे पड़ रही थी जिससे वह चमकीला दिखाई पड़ रहा था ऐसा लग रहा था जैसे तारे मानसरोवर झील में टिमटिमा रहे हो।  यात्रीगण बस से उत्तर कर मानसरोवर झील के दर्शन करने लगे।  कई यात्री इस पावन झील में स्नान करने लगे और कुछ यात्रीगण पूजा अर्चना करने लगे।  झील के पास ही पुलिस चौंकी भी थी। मानसरोवर के किनारे-किनारे दूर में हिमाच्छाादित लंबा पर्वत श्रृखंला लगातार दिखाई दे रहा था।

लगभग आधा घटें के बाद हम लोगो ने दारचेन शहर के लिए प्रस्थान किया। एक बात और यहाँ इतनी ऊंचाई पर सड़के शानदार बनी हुई हैं। दारचेन के रास्ते में हिमालय में अनेक हिमाच्छिदत छोटे-छोटे पर्वत दिखाई दिए। दारचेन कैलाश परिक्रमा का बेस कैंप है हमें शहर के बाहर रोक गया, बस और सामान चेक हुआ और हम लोगो ने शहर में प्रवेश किया।

लगभग 11.30 बजे हम लोग दारचेन पहुंचे। हमारी बस बांऊण्ड्रीवाल से घिरे हुए भवन के पास जाकर रुकी। कैलाश यात्रियों को इसी गेस्ट हाऊस में रूकवाया जाता है। बस के रूकते ही हम लोग अपना-अपना लगेज उतार कर गेस्ट हाऊस में दाखिल हुए। गेस्ट हाउस के सभी कमरे में प्रायः 4-4 बेड लगे हुए थे।  बस से उतरते ही तिब्बती महिलाएँ अपनी पारंपरिक वेशभूषा में भागकर हमारे कमरों तक आ गयीं और मोती/स्टोन की बनी मालाएँ और अन्य आभूषण बेचने हेतु प्रदर्शित करने लगीं। लोगो ने जम कर खरीदारी की । सभी सामानों के भाव में मोल-तोल बहुत किया जा रहा था।

 
1.30 बजे भोजन तैयार होने की सूचना पर भोजन हेतु गए। शाम को 3 बजे दारचेन के स्थानीय बाजार घुमने गए। प्रायः सभी दुकानों के मालिक तिब्बती महिला ही थी। खाने-पीने के सामान के अलावा अन्य सभी सामानों के भाव में मोल-तोल बहुत किया जा रहा था। अंजू जी और hyma जी ने मुझे मालाएँ खरीदने में मेरी सहायता की। आसमान से कोहरा छटने पर दूर पहाड़ों के बीच में शाम को लगभग 5 बजे गेस्ट हाऊस से कैलाश पर्वत के दर्शन हुए। सभी यात्रियों ने कैलाश पर्वत के दर्शन किये। रात्रि भोजन के बाद हम लोग सोने चले गये।
 
दारचेन के बारे में। 

Darchen (Tarchan या Taqin) एक छोटा सा शहर है। यह शहर पवित्र कैलाश पर्वत के बिलकुल सामने हैं। इसकी ऊंचाई 4670 मीटर (15,310 फीट) है और यह कैलाश कोरा का शुरुआती बिंदु है। दारचेन एक तरह से कैलाश और मानसरोवर लेक की प्रक्रिमा में आधार शिविर का काम करता है। दारचेन पहले Lhara के रूप में जाना जाता था। यह पहले भेड़ बकरी चराने वाले  खानाबदोशों का एक महत्वपूर्ण स्टेशन था और यहाँ पर दो ही स्थाई भवन थे। इन में से केवल एक सांस्कृतिक क्रांति बच गया और अब तिब्बती तीर्थयात्रियों इस का  प्रयोग करतें हैं। 
दारचेन जबकि पूरी तरह से एक तिब्बती शहर है लेकिन अब अधिक से अधिक चीनी यहाँ आ कर बस गए हैं और उन्होने अपने होटल और रेस्तरां खोल लिए हैं। 


तकलाकोट होटल में रिसेप्शनिस्ट और उस का बेटा 

होटल के बाहर खड़ी कार 


रास्ते के सुन्दर दृश्य 


चलती बस से खीचें गए फोटो 

चलती बस से खीचें गए फोटो 

चलती बस से खीचें गए फोटो 

चलती बस से खीचें गए फोटो 

चलती बस से खीचें गए फोटो 


राक्षस ताल का सुन्दर दृश्य 

राक्षस ताल 



सुन्दर राक्षस ताल के सामने मैं 



राक्षस ताल के पास खड़ी हमारी बसें 


राक्षस ताल के बारे में जानकारी देता बोर्ड 

राक्षस ताल के पास कड़ी कार 


तकलाकोट से दारचेन तक का हमारा सफर और राक्षस ताल और मानसरोवर लेक का गूगल मैप से लिया चित्र 

चलती बस से खीचें गए फोटो 

चलती बस से खीचें गए फोटो 

चलती बस से खीचें गए फोटो 



मानसरोवर लेक में सूरज की किरणे चमकती हुई 


मानसरोवर लेक के सामने 






यात्रीगण मानसरोवर लेक में स्नान और ध्यान लगाते हुए 

मानसरोवर लेक में बतख 





चलती बस से खीचें गए फोटो 




चलती बस से खीचें गए फोटो 

दूर दारचेन क़स्बा 


दारचेन में ये सामान होटल में  बेचते हुए 

सामान बेचने आई तिब्बती महिला 


कैलाश के प्रथम दर्शन 

दारचेन मार्किट 

दारचेन मार्किट 








Sunday, 6 September 2015

कैलाश मानसरोवर यात्रा ---तेरहवाँ दिन-----तकलाकोट में

 

एक दिन तकलाकोट में
 
तकलाकोट की ऊँचाई लगभा 4050 मीटर

सुबह आराम से सोकर उठे। 8.00 बजे नाश्ता के लिये बुलाया गया। हम लोग नाश्ता के लिए डायनिंग हॉल में पहुंचे। जिस किसी को युआन की जरुरत थी सभी ने एक यात्री अनिरुद्ध भाई को बता दिया और अनिरुद्ध भाई हमारे गाइड गुरु के साथ बैंक में चले गए  युआन लेने।  नाश्ता कर के हम बाजार घूमने चल दिए।  सड़क के दोनो किनारे पर दुकाने बनी हुई है, सभी दुकानों में चीन भाषा में र्बोड लगे हुए है। सभी दैनिक वस्तुओं की दुकानो के अलावा मटन मांस/विदेशी शराब के दुकान भी देखने को मिली। छोटी छोटी दुकानें भी देखने को मिली जहां पर केवल चीनी सामान ही दिखें। वही पर हम एक स्टोर में गए।  वहां की दूकानदार तिब्बती थी।  वार्तालाप की प्रोबलम थी, वे न तो हिंदी जानतीं थीं और न अंग्रेजी और न हम चीनी भाषा। हम सामान उठाकर दिखाते और वो केल्कुलेटर पर अंक लिख देतीं,इतने युआन क़ीमत! हम बार्गेनिंग करते और केलकुलेटर पर अपनी पसंद के अंक लिख देते।  हम ने कुछ एनर्जी -ड्रिंक्स और फल खरीदे। हवा बहुत रूखी और तेज थी।  बाजार में हमें बैंक दिखा और हम बैंक में चले गए जहाँ अनिरुद्ध  और गुरु युआन ले रहे थे।  बाज़ार में ज़्यादा बड़े शॉरूम के अलावा छोटी दुकानें भी थीं। घूमते-घूमते हम काफ़ी दूर चले गए। आगे जाकर नेपाली मार्केट था, जहाँ जैकेट, स्वेटर, शॉल, स्कार्फ़ इत्यादि की दुकानें थीं। वे सामान खरीदने पर युआन के अलावा रुपए भी ले रहे थे। चीन में खाने का इंतजाम हमें अपना करना होता है  इस लिए फ़ूड कमेटी ने आनेवाले दिनों के लिए काफ़ी सारी सब्जी खरीदीं।

आगे की यात्रा के बाद हमें यहीं वापिस आना था। सो ज़रुरी सामान ही आगे ले जाने की सलाह देते हुए फालतू सामान को एक साथ एक बोरे में भरकर अपने दल का न० लिखकर गाइड को सौंपने को कहा। आगे के लिए पोनी और पोर्टर के लिये फाइनेंस कमेटी के पास युआन जमा करने को कहा गया। पोनी के लिए 1050 (10500 रुपए) युआन और पोर्टर के लिए 360 (3600 रुपए) युआन तय थे। मैंने सिर्फ पोनी  लेने का निर्णय लिया और युआन जमा करा दिए।
 
कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान चीन सरकार द्वारा यात्रियों को रूकने की व्यवस्था, तथा खाना बनाने हेतु बर्तन व गैस सहित चुल्हा की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। भोजन सामग्री एवं रसोईया का इंतजाम यात्रियों को स्वयं करना होता है, इसलिए तकलाकोट से दो रसोईया का सामूहिक व्यय पर इंतजाम किया गया। दिल्ली से यात्रा में रवाना होने के पूर्व हम ने  यात्रियों के लिए 10 दिन का राशन सामग्री एवं दो बैग मेडिकल कीट दिल्ली के पंजीकृत संस्था कैलाश मानसरोवर यात्रा समिति द्वारा प्रदाय किया गया था। 

तीर्थयात्रा के तिब्बत-प्रवास में चीन सरकार द्वारा तीर्थ यात्रियों को किसी भी प्रकार की मेडिकल सहायता प्रदान नहीं की जाती। ना ही तीर्थयात्रियों को वहां पर किसी पब और डिस्को में जाने की इजाजत होती है।  दिल्ली और गुंजी से ही डॉ. ने हमें संभावित परेशानियों को ध्यान में रखकर दवाइयाँ इत्यादि अन्य सामान रखने की सलाह दे दी थी। हम उन पर ही आश्रित थे। सच तो यह है कि हमें हमारे गाइड गुरु द्वारा इतना डरा दिया गया था कि मैं तो बाहर मार्किट की फोटो खीचते हुए भी डर रहा था। ऐसा डर था कि कही गलती से सरकारी इमारत की फोटो ना खीच जाये।  

शाम को हमने सामान पैक किया और रात्रि के भोजन के दौरान रघु जी ने (जो दूसरी बार यह यात्रा कर रहे हैं।) एक मैप बना कर हमें आगे की यात्रा के बारे में बताया। इस के बाद निद्रा की गोद में चले गये।
 
तकलाकोट के बारे में


तकलाकोट (Taklakot), जिसे  तिब्बती  में पुरंग (སྤུ་ཧྲེང་རྫོང་, Purang Town) और चीनी में बुरंग (普蘭鎮, Burang Town) कहते हैं, पुरंग तिब्बत का एक जिला है जो उस देश के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में भारत और नेपाल  की सीमा के साथ स्थित है। तिब्बत पर चीन  का क़ब्ज़ा होने के बाद यह चीनी प्रशासनिक प्रणाली में तिब्बत स्वशासित प्रदेश के न्यगारी विभाग में पड़ता है। पुरंग शहर को भारतीय और नेपाली लोग तकलाकोट के नाम से जानते आएँ हैं।यह भारत, तिब्बत और नेपाल  के बीच में एक महत्वपूर्ण व्यापारिक और सांस्कृतिक केन्द्र भी रहा है। कैलाश और मानसरोवर  के तीर्थों को जाते हुए हिन्दू और बौद्ध तीर्थयात्री अक्सर तकलाकोट से गुज़रकर जाते रहे हैं। लगभग 4050 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह शहर कैलाश पर्वत से दक्षिण में घाघरा नदी (जिसे कर्णाली नदी और मापछु खमबाब के नामों से भी जाना जाता है) की घाटी में बसा हुआ है।  इस की आबादी 73000 के लगभग है।

 
अगले भाग में मानसरोवर लेक और कैलाश के प्रथम दर्शन होगें।



यह फोटो होटल में लगे फोटो फ्रेम से खीचीं गई है। 

होटल में जाने का रास्ता 



रघु जी, अभिषेक और मैं 


यह फोटो होटल में लगे फोटो फ्रेम से खीचीं गई है। 


यह फोटो होटल में लगे फोटो फ्रेम से खीचीं गई है। 

यह फोटो होटल में लगे फोटो फ्रेम से खीचीं गई है। 

रघु जी द्वारा मैप बना कर आगे के रास्ते के बारे बताते हुए 

फाइनेंस कमेटी युआन कलेक्ट करती हुई।