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Wednesday, 14 October 2015

कैलाश मानसरोवर यात्रा -----बाइसवाँ दिन----बुद्धि से धारचूला


 
बुद्धि से मालपा, लखनपुर, जिप्ती, मंगती, धारचूला(वाया तवाघाट)

 
सभी यात्री प्रात: 4 बजे उठ गए। चाय डोम में ही ला कर दिया गया। नित्य क्रिया से निवृत हो हम सब तैयार हो गए। हम लोगो को 7 बजे रवाना होना था। आकाश में बादल घिरे हुए थे। तभी हल्की हल्की बारिश शुरू हो गए, हम ने बरसाती पहन ली। भोलेनाथ ने पूरी यात्रा में कही भी बरसाती नहीं निकलवाई थी। आज आखरी पैदल यात्रा के दिन उन्होंने बरसाती की उपयोगिता का अहसास करा दिया था और क्यों इस यात्रा को खतरनाक बोलते हैं। इस का भी अंदाजा आज हो गया था। 
 
बुधी से आगे का रास्ता काफी संकरा, खतरनाक एवं तेज बहाव वाले झरनायुक्त है। बारिश से फिसलन और पहाड़ों से आता बारिश का पानी बहुत कठिनाई उत्पन्न कर रहे थे। बरसाती पहने होने से शरीर तो भीगने से बच गया था। रास्ते में कींचड़ और फिसलन काफी थी।  

इसलिए सावधानी पूर्वक धीरे-धीरे हम लोग आगे बढ़ते गए। लगभग 2.30 से 3 घंटे चलने के बाद हम लोग मालपा कैंप पहुँचे। कुमाऊ मंडल विकास निगम द्वारा यात्रियों के लिए यहां एक छोटे से होटल में चाय-नाश्ता का इंतजाम किया गया था। सभी यात्री यहां पहुंचकर नाश्ते के साथ-साथ थोड़ा विश्राम कर रहे थे। नाश्ता कर हम सभी आगे बढ़ गए। 

रास्ता जाते समय से भी कठिन लग रहा था। जगह-जगह से पगडंडी टूट रही थी। किसी-किसी जगह एक-डेढ़ फुट जगह ही पैर रखने की थी। रास्ते में दाहिनी तरफ पहाड़ी जिसके ऊपर से स्थान-स्थान पर झरने गिर रहे थे। तथा बाएँ ओर नीचे काली नदी तेज रफ्तार से बह रही थी। पानी गिरने से पगडण्डी फिसलनयुक्त हो गया है। अत्यन्त सावधानी पूर्वक धीरे-धीरे चलते हुए हम लोग आगे पैदल ही बढ़े जा रहे हैं।

हम लोग लखनपुर पहुंचे। यहां से दो रास्ते हो जातें हैं। एक रास्ता पहाड़ी के ऊपर से होते हुए गाला जाता है। जाते समय हम धारचूला से नारायण आश्रम ,सिरखा,गाला होकर 4444 सीढ़ियां उतरकर लखनपुर पहुंचे थे। तथा दूसरा रास्ता पहाड़ी से नीचे नदी की ओर उतर कर नदी के किनारे-किनारे ही सीधा गर्बाधार जाता है। वहाँ से हमें धारचूला तक जीप से जाना था। यदि हमारे साथ आई.टी.बी.पी. के जवान न होते तो हमें न मालूम चलता की यहाँ से नीचे जाना है। 

नीचे जाने का कोई रास्ता नहीं था, बस पत्थरों के ऊपर से चल कर नीचे उतरना था। हम लोग पहाड़ी रास्ते से सावधानीपूर्वक नदी की ओर नीचे पैदल ही उतरे तत्पश्चात नदी के किनारे-किनारे ही चलते रहे। रास्ते में हमें पहाड़ की तरफ उल्टा शिवलिंग मिला। हम ने शिवलिंग को नमन कर झरने को पार कर आगे बढ़ते गए।  बीच बीच में हमने पहाड़ो से गिरे मलवे को ऊपर से पैदल पार किया।

आखिर में हम एक पहाड़ के  नीचे पहुंचे जहा से हमे कम से कम आधा किलोमीटर  की खड़ी चढाई चढ़ने थी। जैसे ही मैंने उस चढाई को देखा तो मेरा सर बिलकुल ऊपर हो गया। एक बार तो लगा ये चढाई नहीं हो पाएगी। इस पहाड़ पर भारी भूस्खलन हुआ था और पूरा रास्ता पत्थरों से पटा पड़ा था। ऊपर से नए पत्थर गिरने का भय अलग से था। 

कुछ देर वही विश्राम कर भोले शंकर का नाम ले कर चढाई शुरू की।  किसी तरह रुक रुक कर  मैंने  चढाई को पूरा किया। फिर करीब 1  कि.मी. तक आगे चले और गर्बाधार पहुँच गए वहाँ  पर  कुछ दुकाने और एक दो होटल थे। कुछ यात्री वहाँ बैठे धारचूला के लिए जीप का इंतज़ार रहे थे। वहाँ पर हमारा खाने का इंतज़ाम था। हमने खाना खाया और जीप का इंतज़ार करते हुए पूरी यात्रा संस्मरण बाटते रहे। पोनी पोर्टर का हमारा साथ यहीं तक था। मैंने अपने पोर्टर को गले लगाया और उसे यात्रा पूरी करवाने और हर पल मेरा साथ देने के लिए धन्यवाद किया। उसे उस की बनती राशि और इनाम दे कर विदा किया। 

जीप आने पर हम लोग उस में बैठ गए। शुरू के 10 कि.मी. तक सड़क बहुत ही ख़राब थी। खैर 5 बजे तक हम  धारचूला पहुंचे। धारचूला पहुंच कर जमा सामान उठाया और हमारे बैग भी आ गये थे। 

फिर 2 दिन तक सामान पिट्ठू बैग में निकल लिया, क्यों की अब सामान दिल्ली में ही मिलना था। बैग पैक कर के तैयार किया और नीचे आ गये सूप के बाद खाना खाया। 

वापसी की राह 


गिरे हुए मलबे से नीचे उतरना था और दूसरा रास्ता उपर से गाला को जाता है 

नीचे का रास्ता 

काली नदी का उग्र रूप 


उलटे शिवलिंग को नमन करता हुआ मैं 

नदी के दूसरी तरफ नेपाल में कुछ लोग पुल पार करते हुए। 

नेपाल साइड 

गिरे हुए पहाड़ी मलबे को हम ने पार किया। 

आखरी खडी चढाई 


नदी के पास से ऊपर चढाई करते हुए यात्रीगण 

ऊपर पहुँच कर चढाई का फोटो 


गर्बाधार 

मैं और मेरा पोर्टर 






 
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