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Sunday, 19 March 2017

हरिपुरधार की रोमांचक यात्रा --- भाग - 2

पहाड़ी रास्तों पर बाइक से चलते हुए हम पूरी तरह से प्रकृति का आनंद ले रहे थे। पर मन में एक भय था कही आगे रास्ता बंद ना हो। 35 कि.मी. आगे जा कर संगडाह नामक क़स्बा आता है। संगडाह तक हमें बर्फ नहीं मिली थी। अभी 25 कि.मी. का सफर और बाकी था। ऊपर की तरफ से  कई गाडी वाले अपनी गाडी के बोनेट पर बर्फ रखे आ रहे थे। उनकी गाडी पर रखी बर्फ देख कर आगे का सफर रोमांचक होने का एहसास हो रहा था। यहाँ हम ने आगे के रास्ते के बारे में पूछा तो सभी ने यही कहा रास्ता बंद है। हम यही सोच कर आगे बढ़ गए कि रास्ता गाड़ियों के लिए बंद होगा हम तो बाइक निकाल कर ले ही जायेंगे। जैसे ही हम आगे बढे हवा में ठंडक बढ़ गई। 6 कि.मी. बाद ही हमें बर्फ दिखनी शुरू हो गई। बर्फ देखते ही आँखों में चमक आ गई। आस पास का नजारा ही बदल गया। हमें अभी भी उम्मीद थी कि हम आज हरिपुरधार पहुँच जायेंगे। क्योंकि हरिपुर यहाँ से 17 कि.मी. ही रह गया था। बर्फ में बाइक चलाने में मुश्किल आ रही थी। फिर भी हम धीरे धीरे आगे बढ़ते जा रहे थे। ठण्ड बढ़ती ही जा रही थी। तभी हमें वहाँ दो -चार दुकाने नजर आई। इस जगह का नाम अँधेरा था। हम ने बाइक वही रोक दी। दुकानदारों ने कहा आगे रास्ता बंद है हमें भी यही लगा आगे नहीं जाया जायेगा। हम ने वही दुकान वाले को चाय का आर्डर दिया और फोटो खीचने लग गए। चाय के दौरान दुकान वाले ने बताया अभी हफ्ता रास्ता खुलने के चांस नहीं है। हमे दुःख हो रहा था हरिपुरधार  ना जाने के लिए। 

तभी हम ने दुकान वाले से पूछा कोई और रास्ता है क्या हरिपुर धार जाने का? उन्होंने बताया एक रास्ता है लेकिन वो 25 कि.मी. ज्यादा पडेगा। उस रास्ते में भी आखिर के 3 कि.मी. पर भी रास्ता बंद है बर्फ़बारी के कारण और उस रास्ते में शुरू के 6 कि.मी. रास्ता पथरीला है। अभी 5.30 हो रहे थे। अभी उस नए रास्ते से हरिपुरधार निकलना समझदारी नहीं थी। क्योंकि आधे घंटे में अँधेरा हो जाना था और हमें पहुँचने में कम से कम 3 घंटे लग जाने थे। हम ने अँधेरा में ही एक जगह रूम के बारे में पूछा उसने हमें 800 रुपए किराया बताया। हमने उसे कम करने को बोला तो वो बोला 700 से कम नहीं लगेगा। 700 रुपए बहुत ज्यादा लगे। मैंने उसे 500 रुपए कहे लेकिन वो माना नही। 

हम बाइक से वापिस 7 कि.मी. वापिस संगडाह की तरफ चल दिए। वही एक सरकारी गेस्ट हाउस था हम वहां गए कमरे के लिए। वहां दो-तीन पहाड़ी लोग थे और वो सारे दारु में टल्ली थे। हमे पहले तो उनमे से एक ने बैठा लिया यह कह कर 'आप हमारे मेहमान हो आप को कमरा जरूर देंगे '। थोड़ी देर बैठने के बाद हम ने कमरे के बारे में पूछा तब बोला कमरा तो नहीं है। मुझे बहुत गुस्सा आया क्योंकि एक तो अँधेरा हो रहा था दूसरा ठण्ड भी लग रही थी। तभी वो बोला आप बाइक यही छोड़ कर मेरे साथ गाडी में मेरे गाँव चलो, वहाँ मेरे घर रह जाना। मैंने पूछा गाँव कितनी दूर है तो कहने लगा 15 कि.मी. दूर है। हम ने उसे मना कर दिया। लेकिन वो अड़ गया कहने लगा 'आप मेहमान हो हमारे आप मेरे साथ साथ चलो'हम ने बड़ी मुश्किल से अगली बार आने का बोल कर पीछा छुड़ाया। मुख्य बाजार में आकर एक जगह कमरे का पूछा तो उसने 350 रुपए बताया हमने झट से वो कमर ले लिया। उस कमरे की एक ही दिक्कत थी कि बाथरूम बाहर की तरफ था। खैर हमने कमरे में अपना बैग रखा और कमरे से बाहर आ कर अच्छे से ढाबे की तलाश में लग गए। हमारे होटल के सामने ही एक ढाबा मिल गया जहाँ पर 60 रुपए थाली के हिसाब से रात का खाना खाया। खाना अच्छा बना हुआ था। धीरे धीरे ठण्ड बढ़ती जा रही थी। थकावट की वजह से जल्दी ही नींद आ गई थी। रात का तापमान माइनस में था। सुबह हमारा 7 बजे निकलने का प्रोग्राम था लेकिन ठण्ड की वजह से उठा नहीं गया। खैर हम सुबह नाश्ता कर 8.30 के करीब खाना खा कर वहां से निकल गए।

अब हमें नए रास्ते की तरफ जाना था। मै इस नए रास्ते से जाने के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक हो रहा था। ये रास्ता अँधेरा से कट जाता है। शुरू के 8 कि.मी. तक रास्ता उबड़ खाबड़ वाला था। उसके बाद रास्ता बहुत ज्यादा ठीक तो नही, लेकिन ठीक ठाक था। मजे की बात ये थी अँधेरा से 2 कि.मी. आगे तक बर्फ थी उसके बाद बर्फ नहीं मिली। अँधेरा से 30 कि.मी. के बाद चरना (charna) कर के एक जगह आती है। चरना आ कर आस पास बर्फ दिखनी फिर से शुरू हो गई। चरना से ही एक रास्ता राजगढ़, सोलन को निकल जाता है। यहाँ से अब हरिपुरधार 12 कि.मी. के करीब है। 5 कि.मी. के बाद अच्छी खासी बर्फ मिलनी शुरू हो गई। बाइक चलाना मुश्किल होता जा रहा था। बाइक लगातार बर्फ के कारण फिसल रही थी। बाइक मुश्किल से 5 या 10 की स्पीड से चल रही थी। जैसे जैसे हम आगे बढ़ रहे थे बर्फ बढ़ती जा रही थी। मन में भय था इतने पास आ कर कही आगे  रास्ता बंद ना हो। 

जैसे ही हरिपुरधार 2 कि.मी. रह गया तब यकीन हो गया अब बर्फ हमारा रास्ता नहीं रोक सकती। चारों तरफ बर्फ ही बर्फ थी। वृक्षों पर बर्फ ऐसी लग रही थी जैसे रुई के फोहे रख दिए गए हों। धीरे धीरे हम हरिपुरधार के मुख्य चौराहे पर पहुँच गए। मुख्य चौराहे पर 10 फीट ऊँची बर्फ का टीला बना हुआ था। रास्ते बंद होने के कारण बाजार में भीड़ कम थी। हमने बाइक को एक साइड लगाया और माता भंगयाणी के मंदिर की तरफ चल दिए। माता भगयाणी का मंदिर मुख्य चौराहे 2 कि.मी. ऊंचाई पर है। वैसे वहां तक बाइक या गाडी जा सकती है। लेकिन बर्फ होने के कारण और ऊपर से गाड़ियां आने के कारण और फिसलन के कारण हम ने बाइक नीचे ही खड़ा कर दिया। चढाई शुरू करने से पहले हमने वही एक दूकान से चाय पी। दुकानदार ने बताया रास्ता बंद होने के कारण एक फैमिली बच्चों समेत पिछले 4 दिन से यही फंसी हुई थी। आज ही वो फैमिली निकली है। मुख्य परेशानी इस बात की थी कि सभी पानी की पाइप जम गई हैं और पानी की बहुत ज्यादा दिक्कत है। खैर हम चाय पी कर रास्ते का और आस पास की बर्फ का आनंद लेते हुए मंदिर की तरफ चलते गए। चढाई ज्यादा मुश्किल नहीं थी। 20 मिनट में ही हम मंदिर के द्वार पर पहुँच गए।

हरिपुरधार और माता भंगयाणी के बारे

हरिपुरधार क़स्बा समुद्र तल से 2500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। हरिपुरधार का मुख्य आकर्षण यहाँ से 2 कि.मी. दूर माता भंगयाणी का मंदिर है। यह मंदिर हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं की शिवालिक पहाड़ियों में समुद्र तल से लगभग 8000 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह उत्तरी भारत का प्रसिद्ध मंदिर है। सिरमौर की देवी के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर कई दशको से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। वैसे तो यहाँ साल भर भक्तों का आगमन रहता है, लेकिन नवरात्रो और सक्रांति के समय भक्तों की काफी भीड़ होती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता भगयाणी महादेव के अवतार शिरगुल महाराज की मुँहबोली बहन है। जब शिरगुल महाराज दिल्ली गए थे तब उनकी ख्याति को देख कर तत्कालीन शासक ने उन्हें गाय की कच्ची चमड़े की बेड़ियों में बंदी बना लिया था। चाह कर भी शिरगुल महाराज चमड़े की जंजीर नही तोड़ सकते थे। उस वक़्त बागड़ के गुगा पीर ने जेल की सफाई कर्मचारी की मदद से भगवान् शिरगुल को आजाद करवाया। शिरगुल जी महाराज ने उस सफाई कर्मचारी माँ भंगयाणी को अपनी मुँहबोली बहन बना लिया और हरिपुरधार में एक टीले पर स्थान देकर सर्वशक्तिमान का वरदान दिया।


माता भंगयाणी मंदिर 

मंदिर में जाने के लिए बनी सीढ़ियों पर बर्फ ही बर्फ थी, जो हटा कर एक साइड कर दी गई थी। सीढ़ियों चढ़ने के बाद मंदिर के प्रांगण मे सामने ही भोले बाबा के दर्शन हो गए। कहते हैं यहाँ शिवलिंग की उत्पति अपनेआप हुई थी। मंदिर का प्रांगण पूरी तरह बर्फ से भरा हुआ था। माता के दर्शन के लिए सब से मुश्किल काम उस समय जूते उतारना था। ठण्ड पुरे जोरों पर थी। अब इतनी दूर से मुश्किलों को सहते हुए आये थे तो ये हो ही नही सकता था कि जूते ना उतारने की वजह से मंदिर ना जाये। जूते उतार कर हम ने जैसे ही नंगे पैरों को हमने बर्फ पर रखा पुरे शरीर में एक ठंडी  झुरझुरी सी दौड़ गई। बर्फ में चल कर हम ने माता के दर्शन कर उनका आश्रीवाद ग्रहण किया। उसके बाद मंदिर के प्रांगण में घूमकर आस पास प्रकृति के नजारों का आनंद लेने लगे। मंदिर के उत्तर - पूर्व दिशा की ओर हिमालय की बर्फ से लदी ऊँची चोटियां एक ठंडक का एहसास करवा रही थी।

हरिपुरधार में प्रकृति ने दिल खोल कर सुंदरता बिखेर रखी है। जिस तरफ भी नजर गई सब कुछ मनमोहक, मंत्रमुग्द करता लगा। रात के समय यहाँ का तापमान -8 डिग्री तक पहुँच जाता है। 

कहाँ ठहरें ?

हरिपुरधार में मंदिर समिति ने श्रद्धालुओं के ठहरने का प्रबंध किया हुआ है। मंदिर परिसर में ही 25-30 कमरे हैं ठहरने के लिए। ये कमरे 400 से लेकर 800 रुपए तक मिल जाते हैं। पार्किंग की भी कोई दिक्कत नहीं है। मंदिर समिति ने पर्यटन विभाग के सहयोग से मंदिर के नजदीक ट्रेक्कर हॉस्टल बनाया है। इस के इलावा P.W.D के रेस्टहाउस या प्राइवेट होटल में रह सकते हैं।

मंदिर में हमें दोपहर के 2 बज गए थे। हम ने आज ही पटियाला पहुंचना था। इसलिए जल्दी से हम नीचे की तरफ चल दिए। नीचे उतरते हुए मुझे दूर पहाड़ी पर एक बिल्डिंग दिखी। पहाड़ी की चोटी पर वो अकेली बिल्डिंग मेरा ध्यान खींच रही थी। मैंने झट से कैमरे से उसकी फोटो खींची। नीचे आ कर हम ने अपना बाइक उठाया और वापिस चल दिए। अंबाला पहुँच कर जीजा जी ने गाडी उठाई और पटियाला की तरफ चल दिए और मैं बाइक से अकेला चल कर रात को 12 बजे पटियाला पहुंचा।  

पिछले भाग को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। 


अँधेरा के पास 

अँधेरा में दुकाने जहाँ हम ने दूसरे तरफ के रास्ते के बारे में पूछा 

अँधेरा से हरिपुरधार की तरफ जाता रास्ता 

दूर हरिपुरधार 

जीजा जी 

हरिपुरधार शुरू होते ही। 

हरिपुरधार में क्रेन रास्ता साफ़ करती हुई। 

माता भंगयाणी को जाता हुआ रास्ता 

मंदिर के पास गेट 
मंदिर की तरफ जाती सीढ़ियां 

माता भंगयाणी 

माता के मंदिर से पानी जमा हुआ है। 

माता के मंदिर के सामने एक और मंदिर। 

माता का मंदिर 

मंदिर का प्रांगण 


मंदिर में शिवलिंग 

मंदिर के ऊपर से प्रकृति का खूबसूरत नजारा 

मंदिर के पास छोटी छोटी दुकाने 


मंदिर समिति का ट्रेक्कर हॉस्टल 




वापिसी में दूर पहाड़ी पर एक बिल्डिंग 

बिल्डिंग का ज़ूम कर के लिया फोटो 


हरिपुरधार के चौराहे पर बर्फ के ढेर 


Friday, 3 March 2017

हरिपुरधार की रोमांचक यात्रा --- भाग -1

 हरिपुरधार --- जैतक किला ----रेणुका जी 

मैंने एक एडवेंचर क्लब (कारवाँ क्लब के नाम से) पटियाला में खोला है। उसी के सिलसिले में मैंने एक दिन अपने दोस्त संदीप भाई (जाट देवता) को फ़ोन किया और उनसे दो दिन के लिए कोई अच्छी सी जगह बताने को बोला। तब उन्होंने हरिपुरधार का नाम लिया और खुद चलने को भी कहा। इस यात्रा से पहले मैंने कभी भी हरिपुरधार का नाम नहीं सुना था। मैंने तब पहली बार इस जगह का नाम सुना था। क्लब खुलने के बाद अचानक ही पटियाला में एक ग्रुप में मुझे हरिपुरधार चलने को कहा बाइक पर। तब मैंने फैंसला किया कि पहले इस जगह बाइक से खुद जाया जाये। मैंने इस जगह के बारे में कुछ घुमक्कड़ दोस्तों से जानना चाहा। मुझे बताया नीरज जाट ने इस जगह के बारे में अपने ब्लॉग में लिखा है। मैंने नीरज भाई के ब्लॉग पर हरिपुरधार के बारे में पढा, पर मुझे कुछ ज्यादा जानकारी नही मिली। तब मैंने खुद ही अपने हिसाब से जाने का प्लान बनाया। इस यात्रा पर जाने से एक दिन पहले ही मेरे जीजा जी का भी प्रोग्राम बन गया बाइक पर जाने का मेरे साथ। 

9 जनवरी 2017 को मैं बाइक ले कर सुबह 6 बजे पटियाला से निकला जीजा जी दिल्ली से सीधा अंबाला आ कर मुझे मिलने वाले थे। सुबह जैसे ही मै घर से निकला तो देखा चारों तरफ धुंध ही धुंध थी। इस से ठण्ड का अनुमान तो आप लगा ही सकते हो। 20 कि.मी. चलने के बाद बाइक रोक दी क्योंकि ठण्ड बहुत ही ज्यादा थी ऊपर से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था धुंध की वजह से। एक बार मन में आया वापिस चला जायेधुंध और ठण्ड मिल कर मुझे और मेरे मन को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन जीत घुमक्कड़ी की हुई। दस्ताने उतार कर मैंने हाथों में इनर पहन लिया और उनके ऊपर दस्ताने पहन लिए, हेलमेट के नीचे गर्म कैप पहन ली, फिर हेलमेट ले लिया। इस तरह हाथ और मुँह का ठंड से काफी हद तक बचाव हो गया। इस के बाद तो इस ठण्ड और धुंध का मजा ले कर बाइक चलाई। 8 बजे के करीब मैं अंबाला पहुँच गया। जीजा जी बस स्टैंड के पास मेरा इन्तजार कर रहे थे। धुंध की वजह से मेरी पैंट गीली हो गई थी। अंबाला कैंट में हम ने जीजा जी की कार को बुआ जी के यहाँ खड़ा किया और नाश्ता कर हम बाइक से निकल गए अपनी मंजिल की तरफ। जीजा जी की पहाड़ों पर बाइक से पहली यात्रा थी। धुप निकलने के कारण ठण्ड कम लग रही थी। धुप के कारण मेरी गीली पैंट सूखने लग गई थी। रास्ते में मैंने बाइक जीजा जी को चलाने को दे दी जिस से उनका हाथ बाइक पर बैठ जाये। कालाअंब के बाद पहाड़ी रास्ता शुरू हो गया था। काला अंब के बाद हम नाहन पहुँच गए। 

नाहन से 12 कि.मी. आगे जमता नामक जगह आती है यहाँ से दायीं तरफ को एक सड़क जाती है एक छोटे से किले की तरफ, जिसे जैतक किला कहते हैं। मैंने बाइक किले की तरफ मोड़ ली। 4 km आगे जाने पर बायीं तरफ ऊपर की तरफ जाने पर एक गेट आया जो बंद था और उसके आगे सड़क भी नहीं थी। गेट के आगे ऊपर की तरफ कुछ मकान बने हुए थे। मैंने बाइक गेट की तरफ लगाया और पैदल ऊपर जा कर वहाँ लोगो से किले का रास्ता पूछा। रास्ता उन्ही घरों के आगे से हो कर जाता है। बाइक वहीँ खड़ी कर हम पैदल ही किले की तरफ चल दिए। आधा कि.मी. चलने के बाद एक छोटे से मैदान में पहुंचे। मैदान के दायीं तरफ किला और बाईं तरफ ऊपर की तरफ छोटा सा हेलिपैड था। हम किले के पास पहुँच गए। 

किला एक ऊँची सी जगह पर बना हुआ है। यह किला प्राइवेट प्रॉपर्टी है कुंवर अजय बहादुर की। किला ज्यादातर बंद ही रहता है। वैसे ये बहुत ही छोटा सा किला है किले के प्रवेश द्वार पर दो सैनिकों की हाथ में भाला लिए मूर्तियां हैं। किले से नीचे का नजारा बहुत ही सुंदर दिखाई देता है। हेलिपैड के साथ एक टूटी फूटी चारदीवारी बनी हुई थी ऐसा लग रहा था जैसे चारदीवारी के अंदर कोई कुआं हो। हम अब वापिस चलने लगे, पता नहीं क्यों मेरा मन चारदीवारी की तरफ अटका हुआ था मुझे लगा चारदीवारी पर जा कर देखना चाहिए। मैं वापिस मुड़ा और चारदीवारी की तरफ बढ़ गया थोड़ा सा ऊपर जाने पर चारदीवारी के अंदर जाने के लिए एक रास्ता दिखा। अंदर देख कर मैं हैरान रह गया। अंदर तो छोटा सा मंदिर था और खुले में शिवलिंग था। पहले जरूर वो सुंदर मंदिर होगा। अब तो यह पूरी तरह से जर्जर अवस्था में है। शिवलिंग देख मेरा मन तो प्रसन हो गया। शायद भोले भी यही चाहते थे कि मैं उनके दर्शन करके ही जाऊँ। तभी वो मुझे उस चारदीवारी की तरफ खींच रहे थे। मैंने भोले को प्रणाम किया और वापिस अपने बाइक के पास आ गए। अगर आप इस रास्ते से आ रहे हैं तो जैतक किला देखना बनता है।

जैतक किले का इतिहास   

किले का इतिहास 200 साल पुराना है, एंग्लो गोरखा वार के दौरान गोरखा सैनिक जैतक किले से नाहन पर काबिज थे। कम लोग जानते है कुछ समय के लिए सिरमौर का शासन गोरखा कमांडर काजी रणजोर थापा के हाथ रहा।  यदि इतिहास को खंगाले तो हमें इस बात की जानकारी प्राप्त होगी कि एंग्लो-गोरखा युद्ध की शुरुआत और इस का अंत सिरमौर में ही हुआ था। सिरमौर नरेश को जब सत्ता से बेदखल कर दिया तो उन्होंने गोरखों से सहायता मांगी थी। गोरखों ने उनकी सहायता की किन्तु उन्हें गद्दी पर नहीं बैठा पाए।  इस लिए नाहन में कुछ समय तक गोरखा शासन कायम हुआ था। गोरखा कमांडर रणजोर सिंह थापा ने यहाँ पर ब्रिटिश सेना को मात दी थी। 


जैतक किला 

एंग्लो गोरखा युद्ध 26 दिसम्बर 1814 से 15 दिसम्बर 1816 तक चला। इस युद्ध में गोरखा सैनिकों ने ब्रिटिश और सिरमौर रियासत के सैनिकों की सयुक्त सेना को हराया था। इस युद्ध में करीब 600 सैनिकों के मारे जाने की सुचना है। सिरमौर नरेश कर्म प्रकाश ने देहरादून में जा कर गोरखा कमांडर रणजोर थापा से भेंट कर अपने भाई रतन प्रकाश विरुद्ध कार्यवाही के लिए कहा था। गोरखा सैनिकों ने कर्म प्रकाश के भाई पर कार्यवाही की और उसे सत्ता से बेदखल किया, किन्तु सिरमौर के वास्तविक नरेश को गद्दी पर नहीं बिठाया।  इस प्रकार कर्म प्रकाश को सुबाथू में शरण लेनी पड़ी और बाद में 1826 में उनकी मौत हो गई।  

कर्म प्रकाश की पत्नी और गुलेर की रानी ने ब्रिटिश जनरल ऑक्टरलोनी से सिरमौर का राज वापिस दिलवाने की मांग की। इस अपील के बाद ब्रिटिशर ने गोरखों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। लुधियाना से निकल कर ब्रिटिश सैनिकों ने देहरादून से गोरखा सैनिकों को खदेड़ा और उसके पश्चात वे नाहन पहुंचे और नाहन से करीब 7 कि.मी. दूर स्थित जैतक किले में गोरखों के विरुद्ध आक्रमण कर दिया। किन्तु इस युद्ध में ब्रिटिश सैनिकों को भारी नुक्सान उठाना पड़ा। गोरखा सैनिकों ने जैतक के किले पर तब तक कब्ज़ा जमाये रखा जब तक 1815 में नेपाल सरकार और ब्रिटिश इंडिया गर्वमेंट के बीच समझौता नहीं हो गया। गोरखा वॉर के उपरांत भी ब्रिटिश इंडिया गर्वमेंट ने सिरमौर की महारानी से किया गया अपना वायदा नहीं निभाया, सिरमौर नरेश कर्म प्रकाश को पुनः गद्दी पर नहीं बिठाया। 


यहाँ से हम 1.30 बजे के करीब निकले। अब हमारा अगला पड़ाव रेणुकाजी था। हम घुमावदार सड़कों और प्रकृति का आनंद लेते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। अचानक एक जगह ( रेणुका जी 8 - 10 km ) पहले मैंने एक मंदिर को देखा जो झरने के बीचो बीच ऊंचाई पर बना हुआ था। अभी झरने में पानी कम था। लेकिन बरसात के समय जब पानी पुरे बेग से नीचे आता होगा तो कितना डरावना लगता होगा। इस मंदिर को देख कर अचानक ही मुझे मेरे एक घुमक्कड़ दोस्त सचिन त्यागी जी की याद आ गई।  उन्ही के ब्लॉग पर मैंने इस मंदिर को देखा था। यह मंदिर भगवन राम चंद्र जी का है। 3 बजे के करीब हम रेणुका जी पहुँच गए। हम ने रेणुका जी के दर्शन किये। प्रकृति की गोद में बने रेणुका जी मंदिर और झील बहुत ही मनमोहक दृश्य  प्रस्तुत करते हैं। मंदिर की झील में आप बोटिंग का आनंद भी ले सकते हो। झील के साथ एक zoo भी है। इस zoo को पूरा देखने के लिए बैटरी वाले ऑटो चलते हैं जो 50 रुपए सवारी के हिसाब से पूरा zoo का चक्कर लगवाते हैं। 

रेणुका जी का इतिहास और मेले का महत्व 

माँ-पुत्र के पावन मिलन का 'श्री रेणुका जी' मेला हिमाचल प्रदेश के प्राचीन मेलों में से एक है। जो हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की दशमी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है। जनश्रुति के अनुसार इस दिन भगवान परशुराम जामूकोटी से वर्ष में एक बार अपनी माँ रेणुका जी मिलने आते हैं। यह मेला श्री रेणुका के वात्सल्य व पुत्र की श्रद्धा का अनूठा संगम है। नाहन से 40 कि.मी. की दुरी पर रेणुका झील के किनारे श्री रेणुका जी और भगवान् परशुराम के भव्य मंदिर स्थित हैं। पांच दिन तक चलने वाले इस मेले में आस पास के सभी ग्राम देवता अपनी अपनी पालकी में सुसज्जित हो कर माँ-पुत्र के दिव्य मिलन में शामिल होते हैं। नाहन से ददाहू होते हुए रेणुका जी पहुँचने के लिए गिरिगंगा को पार करना पड़ता है।  इस नदी की उत्पति को यहाँ के लोग एक दंतकथा से जोड़ते हैं, जिसके अनुसार कोई ऋषि हरिद्वार की तीर्थयात्रा करके कमंडल में गंगाजल भर कर कैलाश की ओर जा रहा था। शिमला जिले में कोटखाई नामक स्थान के समीप उनका पाँव फिसल गया और गंगा जल से भरे पात्र से कुछ जल गिर गया। उनके मुँह से निकला "ये गिरी गंगा" उनके ये शब्द ब्रह्मवाक्य हुए। उसी समय वहाँ एक जलधारा निकली जो आज गिरिगंगा के नाम से प्रसिद्ध है। यह नदी सिरमौर को दो भागों में बांटती है जो "गिरिवार और गिरिपार" के नाम से प्रसिद्ध हैं। रेणुका जी से 4 कि.मी. दूर जाटान नामक स्थान में नदी के पानी को सुरंग द्वारा "गिरिवाता जल विधुत" योजना बनाई गई है। यह नदी सिरमौर में बहने वाली सब नदियों से उपयोगी है। गिरिगंगा को पावन नदी समझ कर हजारों श्रद्धालु इस में स्नान करते हैं।   

इसी के साथ बालगंगा नदी है गिरि तथा बालगंगा के संगम पर एक कुंड है। गिरि नदी आगे जा कर जलाल नदी से मिलती है, इस स्थान को प्रयागराज कहते है। यह स्थान त्रिवेणी के नाम से चर्चित है। इस त्रिवेणी को लोग बड़ी श्रद्धा के भाव से मानते है और स्नान करते हैं। वैसे रेणुका स्नान से पहले इस स्थान के स्नान को बहुत ही शुभ माना जाता है। गिरि नदी को पार करने के बाद एक पनचक्की है, उसके पास एक कावेरी-वृक्ष की जड़ में शिवलिंग है। जिसे पंचमुखा सोमेश्वर देवता कहा जाता है। पंचमुखा सोमेश्वर से थोड़ी दूर लगभग 100 मीटर की दुरी पर फिर एक शिवलिंग है इस लिंग का नाम "कपिलेश्वर" है। यह लिंग इस बात के लिए प्रसिद्ध है कि श्रद्धापूर्वक गाय के दूध से लिंग को स्नान करवाने के बाद पुत्रहीन को एक साल के अवधि एक अंदर पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। 

परशुराम तथा रेणुका देवी के पुराने मंदिर तालाब के किनारे रेणुका झील के पैरों के समीप स्थित है। यहाँ रेणुका झील का पानी परशुराम तालाब से आकर मिलता है, जिसे धुनुतर्थ कहते हैं। बताया जाता है कि इस स्थान का बड़ा धार्मिक महत्व है। आजकल लोग इसे रेणुका माँ के चरणों का स्थान के नाम से पुकारते हैं। पुराने मंदिर के पास ही एक मंदिर रेणुका मठ है जिसका जीर्णोद्वार किया गया है। इसमें रेणुका जी की मूर्ति रखी हुई है। लोगों का यह मत है कि यह मंदिर गोरखों ने बनवाया था। 

इसके बाद रेणुका झील की ओर जंगलों की चुनरी से ढके दो पर्वतों के बीच झील की परिक्रमा मंदिर की ओर से शुरू होती है। जिसके चारों ओर पक्का रास्ता बना हुआ है। इस झील में तरह तरह की सुंदर मछलियाँ हैं। जिन्हें श्रद्धालु लोग प्यार से आटे की गोलियां खिलाते हैं। इसी परिक्रमा के दौरान आगे चलकर एक विशाल पीपल का वृक्ष आता है जिसके तने पर लोग अपना नाम गोद कर लिख देते हैं जो नामों अटा पड़ा हुआ है। यहाँ लोग जंगल के खट्टे नींबू को चखने से नहीं चूकते जिसका स्वाद चटपटा होता है। आगे चलने पर माता का सर स्थल आता है। जहाँ पर नरसल की घास अधिक मात्रा में पाई जाती है, जिसमे भक्त परांदे बांधते मानो कि वह माता की चोटी को संवार रहे हों। ऊपर जंबू के टीले से नीचे झील की ओर देखने से झील का आकार स्पष्ट स्त्री के आकार की भांति नजर आता है। झील की सुंदरता, शांत स्वच्छ वातावरण, पशु पक्षी के सुंदर गुंजन, कुचालें भरते जीव, आदि जीवन को एक अनोखा सन्देश देते हुए आनंद प्रदान करते हैं। 

झील के दोनो ओर विशिष्ट पर्वत है। ददाहू की ओर दाईं ओर का पर्वत महेंद्र पर्वत के नाम से प्रसिद्ध है। रेणुका से जम्मु गाँव जाते समय एक टीला मिलता है जिसे तपे का टीला बोलते है। लोगो के अनुसार इसे तपे का टीला इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस टीले पर भृगु का आश्रम था।  इस पर जमादिगण ऋषि ने तपस्या की थी। माता के पैरों के पास आकर परिक्रमा पूरी हो जाती है।  इस स्थान को "शालिपाल" कहते है। 

रेणुका मेले में दशमी के दिन ग्राम जम्मु, जहाँ परशुराम का प्राचीन मंदिर है, में भगवान परशुराम की सवारी बड़ी धूम धाम से खूब सजा-धजा के निकाली जाती है। इस सवारी में पुजारी के साथ वाद्य यंत्र होते हैं और चांदी की पालकी में भगवान् की मूर्ति होती है जिसे गिरि नदी ले जाया जाता है। इस शोभायात्रा में ढोल, नगाड़े, रणसिंगा,दुमानू आदि बाजे बजाते है एवं उसके पीछे लोकप्रिय तीर-कमानो का खेल "ठोडा", नृत्य दल, स्थानीय नृत्य प्रदर्शन व अन्य सांस्कृतिक झलकियाँ दिखाई देती हैं।  यह मेला पूर्णमासी तक चलता रहता है। 

अभी हम मंदिर में दर्शन करके बाहर निकले थे तभी वहाँ किसी बंदे ने हमें बताया हरिपुर धार का रास्ता बर्फ़बारी के कारण बंद है। हम सोच रहे थे कि 6 बजे तक हम हरिपुर धार पहुँच जायेगें। हमने जल्दी से वहाँ परांठे खाये। (जो मैं पटियाला घर से ले कर चला था।) और हरिपुर की तरफ चल दिए। हरिपुर धार रेणुका जी से 60 KM की दुरी पर है।  

अगले भाग में बताऊँगा कैसे हम बर्फ से रास्ता बंद होने के बाबजूद  हरिपुरधार पहुंचे। जबकि पर्यटक रास्ता बंद होने के कारण वापिस अपने घर को जा रहे थे। 

अगले भाग में जाने के लिए यहाँ क्लिक करें। 

किले को जाता हुआ रास्ता 







चारदीवारी के अंदर शिव मंदिर 



झरने के बीच में मंदिर 

परशुराम ताल 

मंदिर को जाता रास्ता 



शिला जहाँ बैठ कर परशुराम जी ने तप किया था। 

परशुराम जी 





रेणुका जी झील 

मंदिर के पास लिया गया फोटो