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Sunday, 19 March 2017

हरिपुरधार की रोमांचक यात्रा --- भाग - 2

पहाड़ी रास्तों पर बाइक से चलते हुए हम पूरी तरह से प्रकृति का आनंद ले रहे थे। पर मन में एक भय था कही आगे रास्ता बंद ना हो। 35 कि.मी. आगे जा कर संगडाह नामक क़स्बा आता है। संगडाह तक हमें बर्फ नहीं मिली थी। अभी 25 कि.मी. का सफर और बाकी था। ऊपर की तरफ से  कई गाडी वाले अपनी गाडी के बोनेट पर बर्फ रखे आ रहे थे। उनकी गाडी पर रखी बर्फ देख कर आगे का सफर रोमांचक होने का एहसास हो रहा था। यहाँ हम ने आगे के रास्ते के बारे में पूछा तो सभी ने यही कहा रास्ता बंद है। हम यही सोच कर आगे बढ़ गए कि रास्ता गाड़ियों के लिए बंद होगा हम तो बाइक निकाल कर ले ही जायेंगे। जैसे ही हम आगे बढे हवा में ठंडक बढ़ गई। 6 कि.मी. बाद ही हमें बर्फ दिखनी शुरू हो गई। बर्फ देखते ही आँखों में चमक आ गई। आस पास का नजारा ही बदल गया। हमें अभी भी उम्मीद थी कि हम आज हरिपुरधार पहुँच जायेंगे। क्योंकि हरिपुर यहाँ से 17 कि.मी. ही रह गया था। बर्फ में बाइक चलाने में मुश्किल आ रही थी। फिर भी हम धीरे धीरे आगे बढ़ते जा रहे थे। ठण्ड बढ़ती ही जा रही थी। तभी हमें वहाँ दो -चार दुकाने नजर आई। इस जगह का नाम अँधेरा था। हम ने बाइक वही रोक दी। दुकानदारों ने कहा आगे रास्ता बंद है हमें भी यही लगा आगे नहीं जाया जायेगा। हम ने वही दुकान वाले को चाय का आर्डर दिया और फोटो खीचने लग गए। चाय के दौरान दुकान वाले ने बताया अभी हफ्ता रास्ता खुलने के चांस नहीं है। हमे दुःख हो रहा था हरिपुरधार  ना जाने के लिए। 

तभी हम ने दुकान वाले से पूछा कोई और रास्ता है क्या हरिपुर धार जाने का? उन्होंने बताया एक रास्ता है लेकिन वो 25 कि.मी. ज्यादा पडेगा। उस रास्ते में भी आखिर के 3 कि.मी. पर भी रास्ता बंद है बर्फ़बारी के कारण और उस रास्ते में शुरू के 6 कि.मी. रास्ता पथरीला है। अभी 5.30 हो रहे थे। अभी उस नए रास्ते से हरिपुरधार निकलना समझदारी नहीं थी। क्योंकि आधे घंटे में अँधेरा हो जाना था और हमें पहुँचने में कम से कम 3 घंटे लग जाने थे। हम ने अँधेरा में ही एक जगह रूम के बारे में पूछा उसने हमें 800 रुपए किराया बताया। हमने उसे कम करने को बोला तो वो बोला 700 से कम नहीं लगेगा। 700 रुपए बहुत ज्यादा लगे। मैंने उसे 500 रुपए कहे लेकिन वो माना नही। 

हम बाइक से वापिस 7 कि.मी. वापिस संगडाह की तरफ चल दिए। वही एक सरकारी गेस्ट हाउस था हम वहां गए कमरे के लिए। वहां दो-तीन पहाड़ी लोग थे और वो सारे दारु में टल्ली थे। हमे पहले तो उनमे से एक ने बैठा लिया यह कह कर 'आप हमारे मेहमान हो आप को कमरा जरूर देंगे '। थोड़ी देर बैठने के बाद हम ने कमरे के बारे में पूछा तब बोला कमरा तो नहीं है। मुझे बहुत गुस्सा आया क्योंकि एक तो अँधेरा हो रहा था दूसरा ठण्ड भी लग रही थी। तभी वो बोला आप बाइक यही छोड़ कर मेरे साथ गाडी में मेरे गाँव चलो, वहाँ मेरे घर रह जाना। मैंने पूछा गाँव कितनी दूर है तो कहने लगा 15 कि.मी. दूर है। हम ने उसे मना कर दिया। लेकिन वो अड़ गया कहने लगा 'आप मेहमान हो हमारे आप मेरे साथ साथ चलो'हम ने बड़ी मुश्किल से अगली बार आने का बोल कर पीछा छुड़ाया। मुख्य बाजार में आकर एक जगह कमरे का पूछा तो उसने 350 रुपए बताया हमने झट से वो कमर ले लिया। उस कमरे की एक ही दिक्कत थी कि बाथरूम बाहर की तरफ था। खैर हमने कमरे में अपना बैग रखा और कमरे से बाहर आ कर अच्छे से ढाबे की तलाश में लग गए। हमारे होटल के सामने ही एक ढाबा मिल गया जहाँ पर 60 रुपए थाली के हिसाब से रात का खाना खाया। खाना अच्छा बना हुआ था। धीरे धीरे ठण्ड बढ़ती जा रही थी। थकावट की वजह से जल्दी ही नींद आ गई थी। रात का तापमान माइनस में था। सुबह हमारा 7 बजे निकलने का प्रोग्राम था लेकिन ठण्ड की वजह से उठा नहीं गया। खैर हम सुबह नाश्ता कर 8.30 के करीब खाना खा कर वहां से निकल गए।

अब हमें नए रास्ते की तरफ जाना था। मै इस नए रास्ते से जाने के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक हो रहा था। ये रास्ता अँधेरा से कट जाता है। शुरू के 8 कि.मी. तक रास्ता उबड़ खाबड़ वाला था। उसके बाद रास्ता बहुत ज्यादा ठीक तो नही, लेकिन ठीक ठाक था। मजे की बात ये थी अँधेरा से 2 कि.मी. आगे तक बर्फ थी उसके बाद बर्फ नहीं मिली। अँधेरा से 30 कि.मी. के बाद चरना (charna) कर के एक जगह आती है। चरना आ कर आस पास बर्फ दिखनी फिर से शुरू हो गई। चरना से ही एक रास्ता राजगढ़, सोलन को निकल जाता है। यहाँ से अब हरिपुरधार 12 कि.मी. के करीब है। 5 कि.मी. के बाद अच्छी खासी बर्फ मिलनी शुरू हो गई। बाइक चलाना मुश्किल होता जा रहा था। बाइक लगातार बर्फ के कारण फिसल रही थी। बाइक मुश्किल से 5 या 10 की स्पीड से चल रही थी। जैसे जैसे हम आगे बढ़ रहे थे बर्फ बढ़ती जा रही थी। मन में भय था इतने पास आ कर कही आगे  रास्ता बंद ना हो। 

जैसे ही हरिपुरधार 2 कि.मी. रह गया तब यकीन हो गया अब बर्फ हमारा रास्ता नहीं रोक सकती। चारों तरफ बर्फ ही बर्फ थी। वृक्षों पर बर्फ ऐसी लग रही थी जैसे रुई के फोहे रख दिए गए हों। धीरे धीरे हम हरिपुरधार के मुख्य चौराहे पर पहुँच गए। मुख्य चौराहे पर 10 फीट ऊँची बर्फ का टीला बना हुआ था। रास्ते बंद होने के कारण बाजार में भीड़ कम थी। हमने बाइक को एक साइड लगाया और माता भंगयाणी के मंदिर की तरफ चल दिए। माता भगयाणी का मंदिर मुख्य चौराहे 2 कि.मी. ऊंचाई पर है। वैसे वहां तक बाइक या गाडी जा सकती है। लेकिन बर्फ होने के कारण और ऊपर से गाड़ियां आने के कारण और फिसलन के कारण हम ने बाइक नीचे ही खड़ा कर दिया। चढाई शुरू करने से पहले हमने वही एक दूकान से चाय पी। दुकानदार ने बताया रास्ता बंद होने के कारण एक फैमिली बच्चों समेत पिछले 4 दिन से यही फंसी हुई थी। आज ही वो फैमिली निकली है। मुख्य परेशानी इस बात की थी कि सभी पानी की पाइप जम गई हैं और पानी की बहुत ज्यादा दिक्कत है। खैर हम चाय पी कर रास्ते का और आस पास की बर्फ का आनंद लेते हुए मंदिर की तरफ चलते गए। चढाई ज्यादा मुश्किल नहीं थी। 20 मिनट में ही हम मंदिर के द्वार पर पहुँच गए।

हरिपुरधार और माता भंगयाणी के बारे

हरिपुरधार क़स्बा समुद्र तल से 2500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। हरिपुरधार का मुख्य आकर्षण यहाँ से 2 कि.मी. दूर माता भंगयाणी का मंदिर है। यह मंदिर हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं की शिवालिक पहाड़ियों में समुद्र तल से लगभग 8000 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह उत्तरी भारत का प्रसिद्ध मंदिर है। सिरमौर की देवी के नाम से प्रसिद्ध यह मंदिर कई दशको से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। वैसे तो यहाँ साल भर भक्तों का आगमन रहता है, लेकिन नवरात्रो और सक्रांति के समय भक्तों की काफी भीड़ होती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता भगयाणी महादेव के अवतार शिरगुल महाराज की मुँहबोली बहन है। जब शिरगुल महाराज दिल्ली गए थे तब उनकी ख्याति को देख कर तत्कालीन शासक ने उन्हें गाय की कच्ची चमड़े की बेड़ियों में बंदी बना लिया था। चाह कर भी शिरगुल महाराज चमड़े की जंजीर नही तोड़ सकते थे। उस वक़्त बागड़ के गुगा पीर ने जेल की सफाई कर्मचारी की मदद से भगवान् शिरगुल को आजाद करवाया। शिरगुल जी महाराज ने उस सफाई कर्मचारी माँ भंगयाणी को अपनी मुँहबोली बहन बना लिया और हरिपुरधार में एक टीले पर स्थान देकर सर्वशक्तिमान का वरदान दिया।


माता भंगयाणी मंदिर 

मंदिर में जाने के लिए बनी सीढ़ियों पर बर्फ ही बर्फ थी, जो हटा कर एक साइड कर दी गई थी। सीढ़ियों चढ़ने के बाद मंदिर के प्रांगण मे सामने ही भोले बाबा के दर्शन हो गए। कहते हैं यहाँ शिवलिंग की उत्पति अपनेआप हुई थी। मंदिर का प्रांगण पूरी तरह बर्फ से भरा हुआ था। माता के दर्शन के लिए सब से मुश्किल काम उस समय जूते उतारना था। ठण्ड पुरे जोरों पर थी। अब इतनी दूर से मुश्किलों को सहते हुए आये थे तो ये हो ही नही सकता था कि जूते ना उतारने की वजह से मंदिर ना जाये। जूते उतार कर हम ने जैसे ही नंगे पैरों को हमने बर्फ पर रखा पुरे शरीर में एक ठंडी  झुरझुरी सी दौड़ गई। बर्फ में चल कर हम ने माता के दर्शन कर उनका आश्रीवाद ग्रहण किया। उसके बाद मंदिर के प्रांगण में घूमकर आस पास प्रकृति के नजारों का आनंद लेने लगे। मंदिर के उत्तर - पूर्व दिशा की ओर हिमालय की बर्फ से लदी ऊँची चोटियां एक ठंडक का एहसास करवा रही थी।

हरिपुरधार में प्रकृति ने दिल खोल कर सुंदरता बिखेर रखी है। जिस तरफ भी नजर गई सब कुछ मनमोहक, मंत्रमुग्द करता लगा। रात के समय यहाँ का तापमान -8 डिग्री तक पहुँच जाता है। 

कहाँ ठहरें ?

हरिपुरधार में मंदिर समिति ने श्रद्धालुओं के ठहरने का प्रबंध किया हुआ है। मंदिर परिसर में ही 25-30 कमरे हैं ठहरने के लिए। ये कमरे 400 से लेकर 800 रुपए तक मिल जाते हैं। पार्किंग की भी कोई दिक्कत नहीं है। मंदिर समिति ने पर्यटन विभाग के सहयोग से मंदिर के नजदीक ट्रेक्कर हॉस्टल बनाया है। इस के इलावा P.W.D के रेस्टहाउस या प्राइवेट होटल में रह सकते हैं।

मंदिर में हमें दोपहर के 2 बज गए थे। हम ने आज ही पटियाला पहुंचना था। इसलिए जल्दी से हम नीचे की तरफ चल दिए। नीचे उतरते हुए मुझे दूर पहाड़ी पर एक बिल्डिंग दिखी। पहाड़ी की चोटी पर वो अकेली बिल्डिंग मेरा ध्यान खींच रही थी। मैंने झट से कैमरे से उसकी फोटो खींची। नीचे आ कर हम ने अपना बाइक उठाया और वापिस चल दिए। अंबाला पहुँच कर जीजा जी ने गाडी उठाई और पटियाला की तरफ चल दिए और मैं बाइक से अकेला चल कर रात को 12 बजे पटियाला पहुंचा।  

पिछले भाग को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। 


अँधेरा के पास 

अँधेरा में दुकाने जहाँ हम ने दूसरे तरफ के रास्ते के बारे में पूछा 

अँधेरा से हरिपुरधार की तरफ जाता रास्ता 

दूर हरिपुरधार 

जीजा जी 

हरिपुरधार शुरू होते ही। 

हरिपुरधार में क्रेन रास्ता साफ़ करती हुई। 

माता भंगयाणी को जाता हुआ रास्ता 

मंदिर के पास गेट 
मंदिर की तरफ जाती सीढ़ियां 

माता भंगयाणी 

माता के मंदिर से पानी जमा हुआ है। 

माता के मंदिर के सामने एक और मंदिर। 

माता का मंदिर 

मंदिर का प्रांगण 


मंदिर में शिवलिंग 

मंदिर के ऊपर से प्रकृति का खूबसूरत नजारा 

मंदिर के पास छोटी छोटी दुकाने 


मंदिर समिति का ट्रेक्कर हॉस्टल 




वापिसी में दूर पहाड़ी पर एक बिल्डिंग 

बिल्डिंग का ज़ूम कर के लिया फोटो 


हरिपुरधार के चौराहे पर बर्फ के ढेर 


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