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Friday, 3 March 2017

हरिपुरधार की रोमांचक यात्रा --- भाग -1

 हरिपुरधार --- जैतक किला ----रेणुका जी 

मैंने एक एडवेंचर क्लब (कारवाँ क्लब के नाम से) पटियाला में खोला है। उसी के सिलसिले में मैंने एक दिन अपने दोस्त संदीप भाई (जाट देवता) को फ़ोन किया और उनसे दो दिन के लिए कोई अच्छी सी जगह बताने को बोला। तब उन्होंने हरिपुरधार का नाम लिया और खुद चलने को भी कहा। इस यात्रा से पहले मैंने कभी भी हरिपुरधार का नाम नहीं सुना था। मैंने तब पहली बार इस जगह का नाम सुना था। क्लब खुलने के बाद अचानक ही पटियाला में एक ग्रुप में मुझे हरिपुरधार चलने को कहा बाइक पर। तब मैंने फैंसला किया कि पहले इस जगह बाइक से खुद जाया जाये। मैंने इस जगह के बारे में कुछ घुमक्कड़ दोस्तों से जानना चाहा। मुझे बताया नीरज जाट ने इस जगह के बारे में अपने ब्लॉग में लिखा है। मैंने नीरज भाई के ब्लॉग पर हरिपुरधार के बारे में पढा, पर मुझे कुछ ज्यादा जानकारी नही मिली। तब मैंने खुद ही अपने हिसाब से जाने का प्लान बनाया। इस यात्रा पर जाने से एक दिन पहले ही मेरे जीजा जी का भी प्रोग्राम बन गया बाइक पर जाने का मेरे साथ। 

9 जनवरी 2017 को मैं बाइक ले कर सुबह 6 बजे पटियाला से निकला जीजा जी दिल्ली से सीधा अंबाला आ कर मुझे मिलने वाले थे। सुबह जैसे ही मै घर से निकला तो देखा चारों तरफ धुंध ही धुंध थी। इस से ठण्ड का अनुमान तो आप लगा ही सकते हो। 20 कि.मी. चलने के बाद बाइक रोक दी क्योंकि ठण्ड बहुत ही ज्यादा थी ऊपर से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था धुंध की वजह से। एक बार मन में आया वापिस चला जायेधुंध और ठण्ड मिल कर मुझे और मेरे मन को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन जीत घुमक्कड़ी की हुई। दस्ताने उतार कर मैंने हाथों में इनर पहन लिया और उनके ऊपर दस्ताने पहन लिए, हेलमेट के नीचे गर्म कैप पहन ली, फिर हेलमेट ले लिया। इस तरह हाथ और मुँह का ठंड से काफी हद तक बचाव हो गया। इस के बाद तो इस ठण्ड और धुंध का मजा ले कर बाइक चलाई। 8 बजे के करीब मैं अंबाला पहुँच गया। जीजा जी बस स्टैंड के पास मेरा इन्तजार कर रहे थे। धुंध की वजह से मेरी पैंट गीली हो गई थी। अंबाला कैंट में हम ने जीजा जी की कार को बुआ जी के यहाँ खड़ा किया और नाश्ता कर हम बाइक से निकल गए अपनी मंजिल की तरफ। जीजा जी की पहाड़ों पर बाइक से पहली यात्रा थी। धुप निकलने के कारण ठण्ड कम लग रही थी। धुप के कारण मेरी गीली पैंट सूखने लग गई थी। रास्ते में मैंने बाइक जीजा जी को चलाने को दे दी जिस से उनका हाथ बाइक पर बैठ जाये। कालाअंब के बाद पहाड़ी रास्ता शुरू हो गया था। काला अंब के बाद हम नाहन पहुँच गए। 

नाहन से 12 कि.मी. आगे जमता नामक जगह आती है यहाँ से दायीं तरफ को एक सड़क जाती है एक छोटे से किले की तरफ, जिसे जैतक किला कहते हैं। मैंने बाइक किले की तरफ मोड़ ली। 4 km आगे जाने पर बायीं तरफ ऊपर की तरफ जाने पर एक गेट आया जो बंद था और उसके आगे सड़क भी नहीं थी। गेट के आगे ऊपर की तरफ कुछ मकान बने हुए थे। मैंने बाइक गेट की तरफ लगाया और पैदल ऊपर जा कर वहाँ लोगो से किले का रास्ता पूछा। रास्ता उन्ही घरों के आगे से हो कर जाता है। बाइक वहीँ खड़ी कर हम पैदल ही किले की तरफ चल दिए। आधा कि.मी. चलने के बाद एक छोटे से मैदान में पहुंचे। मैदान के दायीं तरफ किला और बाईं तरफ ऊपर की तरफ छोटा सा हेलिपैड था। हम किले के पास पहुँच गए। 

किला एक ऊँची सी जगह पर बना हुआ है। यह किला प्राइवेट प्रॉपर्टी है कुंवर अजय बहादुर की। किला ज्यादातर बंद ही रहता है। वैसे ये बहुत ही छोटा सा किला है किले के प्रवेश द्वार पर दो सैनिकों की हाथ में भाला लिए मूर्तियां हैं। किले से नीचे का नजारा बहुत ही सुंदर दिखाई देता है। हेलिपैड के साथ एक टूटी फूटी चारदीवारी बनी हुई थी ऐसा लग रहा था जैसे चारदीवारी के अंदर कोई कुआं हो। हम अब वापिस चलने लगे, पता नहीं क्यों मेरा मन चारदीवारी की तरफ अटका हुआ था मुझे लगा चारदीवारी पर जा कर देखना चाहिए। मैं वापिस मुड़ा और चारदीवारी की तरफ बढ़ गया थोड़ा सा ऊपर जाने पर चारदीवारी के अंदर जाने के लिए एक रास्ता दिखा। अंदर देख कर मैं हैरान रह गया। अंदर तो छोटा सा मंदिर था और खुले में शिवलिंग था। पहले जरूर वो सुंदर मंदिर होगा। अब तो यह पूरी तरह से जर्जर अवस्था में है। शिवलिंग देख मेरा मन तो प्रसन हो गया। शायद भोले भी यही चाहते थे कि मैं उनके दर्शन करके ही जाऊँ। तभी वो मुझे उस चारदीवारी की तरफ खींच रहे थे। मैंने भोले को प्रणाम किया और वापिस अपने बाइक के पास आ गए। अगर आप इस रास्ते से आ रहे हैं तो जैतक किला देखना बनता है।

जैतक किले का इतिहास   

किले का इतिहास 200 साल पुराना है, एंग्लो गोरखा वार के दौरान गोरखा सैनिक जैतक किले से नाहन पर काबिज थे। कम लोग जानते है कुछ समय के लिए सिरमौर का शासन गोरखा कमांडर काजी रणजोर थापा के हाथ रहा।  यदि इतिहास को खंगाले तो हमें इस बात की जानकारी प्राप्त होगी कि एंग्लो-गोरखा युद्ध की शुरुआत और इस का अंत सिरमौर में ही हुआ था। सिरमौर नरेश को जब सत्ता से बेदखल कर दिया तो उन्होंने गोरखों से सहायता मांगी थी। गोरखों ने उनकी सहायता की किन्तु उन्हें गद्दी पर नहीं बैठा पाए।  इस लिए नाहन में कुछ समय तक गोरखा शासन कायम हुआ था। गोरखा कमांडर रणजोर सिंह थापा ने यहाँ पर ब्रिटिश सेना को मात दी थी। 


जैतक किला 

एंग्लो गोरखा युद्ध 26 दिसम्बर 1814 से 15 दिसम्बर 1816 तक चला। इस युद्ध में गोरखा सैनिकों ने ब्रिटिश और सिरमौर रियासत के सैनिकों की सयुक्त सेना को हराया था। इस युद्ध में करीब 600 सैनिकों के मारे जाने की सुचना है। सिरमौर नरेश कर्म प्रकाश ने देहरादून में जा कर गोरखा कमांडर रणजोर थापा से भेंट कर अपने भाई रतन प्रकाश विरुद्ध कार्यवाही के लिए कहा था। गोरखा सैनिकों ने कर्म प्रकाश के भाई पर कार्यवाही की और उसे सत्ता से बेदखल किया, किन्तु सिरमौर के वास्तविक नरेश को गद्दी पर नहीं बिठाया।  इस प्रकार कर्म प्रकाश को सुबाथू में शरण लेनी पड़ी और बाद में 1826 में उनकी मौत हो गई।  

कर्म प्रकाश की पत्नी और गुलेर की रानी ने ब्रिटिश जनरल ऑक्टरलोनी से सिरमौर का राज वापिस दिलवाने की मांग की। इस अपील के बाद ब्रिटिशर ने गोरखों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। लुधियाना से निकल कर ब्रिटिश सैनिकों ने देहरादून से गोरखा सैनिकों को खदेड़ा और उसके पश्चात वे नाहन पहुंचे और नाहन से करीब 7 कि.मी. दूर स्थित जैतक किले में गोरखों के विरुद्ध आक्रमण कर दिया। किन्तु इस युद्ध में ब्रिटिश सैनिकों को भारी नुक्सान उठाना पड़ा। गोरखा सैनिकों ने जैतक के किले पर तब तक कब्ज़ा जमाये रखा जब तक 1815 में नेपाल सरकार और ब्रिटिश इंडिया गर्वमेंट के बीच समझौता नहीं हो गया। गोरखा वॉर के उपरांत भी ब्रिटिश इंडिया गर्वमेंट ने सिरमौर की महारानी से किया गया अपना वायदा नहीं निभाया, सिरमौर नरेश कर्म प्रकाश को पुनः गद्दी पर नहीं बिठाया। 


यहाँ से हम 1.30 बजे के करीब निकले। अब हमारा अगला पड़ाव रेणुकाजी था। हम घुमावदार सड़कों और प्रकृति का आनंद लेते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। अचानक एक जगह ( रेणुका जी 8 - 10 km ) पहले मैंने एक मंदिर को देखा जो झरने के बीचो बीच ऊंचाई पर बना हुआ था। अभी झरने में पानी कम था। लेकिन बरसात के समय जब पानी पुरे बेग से नीचे आता होगा तो कितना डरावना लगता होगा। इस मंदिर को देख कर अचानक ही मुझे मेरे एक घुमक्कड़ दोस्त सचिन त्यागी जी की याद आ गई।  उन्ही के ब्लॉग पर मैंने इस मंदिर को देखा था। यह मंदिर भगवन राम चंद्र जी का है। 3 बजे के करीब हम रेणुका जी पहुँच गए। हम ने रेणुका जी के दर्शन किये। प्रकृति की गोद में बने रेणुका जी मंदिर और झील बहुत ही मनमोहक दृश्य  प्रस्तुत करते हैं। मंदिर की झील में आप बोटिंग का आनंद भी ले सकते हो। झील के साथ एक zoo भी है। इस zoo को पूरा देखने के लिए बैटरी वाले ऑटो चलते हैं जो 50 रुपए सवारी के हिसाब से पूरा zoo का चक्कर लगवाते हैं। 

रेणुका जी का इतिहास और मेले का महत्व 

माँ-पुत्र के पावन मिलन का 'श्री रेणुका जी' मेला हिमाचल प्रदेश के प्राचीन मेलों में से एक है। जो हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की दशमी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है। जनश्रुति के अनुसार इस दिन भगवान परशुराम जामूकोटी से वर्ष में एक बार अपनी माँ रेणुका जी मिलने आते हैं। यह मेला श्री रेणुका के वात्सल्य व पुत्र की श्रद्धा का अनूठा संगम है। नाहन से 40 कि.मी. की दुरी पर रेणुका झील के किनारे श्री रेणुका जी और भगवान् परशुराम के भव्य मंदिर स्थित हैं। पांच दिन तक चलने वाले इस मेले में आस पास के सभी ग्राम देवता अपनी अपनी पालकी में सुसज्जित हो कर माँ-पुत्र के दिव्य मिलन में शामिल होते हैं। नाहन से ददाहू होते हुए रेणुका जी पहुँचने के लिए गिरिगंगा को पार करना पड़ता है।  इस नदी की उत्पति को यहाँ के लोग एक दंतकथा से जोड़ते हैं, जिसके अनुसार कोई ऋषि हरिद्वार की तीर्थयात्रा करके कमंडल में गंगाजल भर कर कैलाश की ओर जा रहा था। शिमला जिले में कोटखाई नामक स्थान के समीप उनका पाँव फिसल गया और गंगा जल से भरे पात्र से कुछ जल गिर गया। उनके मुँह से निकला "ये गिरी गंगा" उनके ये शब्द ब्रह्मवाक्य हुए। उसी समय वहाँ एक जलधारा निकली जो आज गिरिगंगा के नाम से प्रसिद्ध है। यह नदी सिरमौर को दो भागों में बांटती है जो "गिरिवार और गिरिपार" के नाम से प्रसिद्ध हैं। रेणुका जी से 4 कि.मी. दूर जाटान नामक स्थान में नदी के पानी को सुरंग द्वारा "गिरिवाता जल विधुत" योजना बनाई गई है। यह नदी सिरमौर में बहने वाली सब नदियों से उपयोगी है। गिरिगंगा को पावन नदी समझ कर हजारों श्रद्धालु इस में स्नान करते हैं।   

इसी के साथ बालगंगा नदी है गिरि तथा बालगंगा के संगम पर एक कुंड है। गिरि नदी आगे जा कर जलाल नदी से मिलती है, इस स्थान को प्रयागराज कहते है। यह स्थान त्रिवेणी के नाम से चर्चित है। इस त्रिवेणी को लोग बड़ी श्रद्धा के भाव से मानते है और स्नान करते हैं। वैसे रेणुका स्नान से पहले इस स्थान के स्नान को बहुत ही शुभ माना जाता है। गिरि नदी को पार करने के बाद एक पनचक्की है, उसके पास एक कावेरी-वृक्ष की जड़ में शिवलिंग है। जिसे पंचमुखा सोमेश्वर देवता कहा जाता है। पंचमुखा सोमेश्वर से थोड़ी दूर लगभग 100 मीटर की दुरी पर फिर एक शिवलिंग है इस लिंग का नाम "कपिलेश्वर" है। यह लिंग इस बात के लिए प्रसिद्ध है कि श्रद्धापूर्वक गाय के दूध से लिंग को स्नान करवाने के बाद पुत्रहीन को एक साल के अवधि एक अंदर पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। 

परशुराम तथा रेणुका देवी के पुराने मंदिर तालाब के किनारे रेणुका झील के पैरों के समीप स्थित है। यहाँ रेणुका झील का पानी परशुराम तालाब से आकर मिलता है, जिसे धुनुतर्थ कहते हैं। बताया जाता है कि इस स्थान का बड़ा धार्मिक महत्व है। आजकल लोग इसे रेणुका माँ के चरणों का स्थान के नाम से पुकारते हैं। पुराने मंदिर के पास ही एक मंदिर रेणुका मठ है जिसका जीर्णोद्वार किया गया है। इसमें रेणुका जी की मूर्ति रखी हुई है। लोगों का यह मत है कि यह मंदिर गोरखों ने बनवाया था। 

इसके बाद रेणुका झील की ओर जंगलों की चुनरी से ढके दो पर्वतों के बीच झील की परिक्रमा मंदिर की ओर से शुरू होती है। जिसके चारों ओर पक्का रास्ता बना हुआ है। इस झील में तरह तरह की सुंदर मछलियाँ हैं। जिन्हें श्रद्धालु लोग प्यार से आटे की गोलियां खिलाते हैं। इसी परिक्रमा के दौरान आगे चलकर एक विशाल पीपल का वृक्ष आता है जिसके तने पर लोग अपना नाम गोद कर लिख देते हैं जो नामों अटा पड़ा हुआ है। यहाँ लोग जंगल के खट्टे नींबू को चखने से नहीं चूकते जिसका स्वाद चटपटा होता है। आगे चलने पर माता का सर स्थल आता है। जहाँ पर नरसल की घास अधिक मात्रा में पाई जाती है, जिसमे भक्त परांदे बांधते मानो कि वह माता की चोटी को संवार रहे हों। ऊपर जंबू के टीले से नीचे झील की ओर देखने से झील का आकार स्पष्ट स्त्री के आकार की भांति नजर आता है। झील की सुंदरता, शांत स्वच्छ वातावरण, पशु पक्षी के सुंदर गुंजन, कुचालें भरते जीव, आदि जीवन को एक अनोखा सन्देश देते हुए आनंद प्रदान करते हैं। 

झील के दोनो ओर विशिष्ट पर्वत है। ददाहू की ओर दाईं ओर का पर्वत महेंद्र पर्वत के नाम से प्रसिद्ध है। रेणुका से जम्मु गाँव जाते समय एक टीला मिलता है जिसे तपे का टीला बोलते है। लोगो के अनुसार इसे तपे का टीला इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस टीले पर भृगु का आश्रम था।  इस पर जमादिगण ऋषि ने तपस्या की थी। माता के पैरों के पास आकर परिक्रमा पूरी हो जाती है।  इस स्थान को "शालिपाल" कहते है। 

रेणुका मेले में दशमी के दिन ग्राम जम्मु, जहाँ परशुराम का प्राचीन मंदिर है, में भगवान परशुराम की सवारी बड़ी धूम धाम से खूब सजा-धजा के निकाली जाती है। इस सवारी में पुजारी के साथ वाद्य यंत्र होते हैं और चांदी की पालकी में भगवान् की मूर्ति होती है जिसे गिरि नदी ले जाया जाता है। इस शोभायात्रा में ढोल, नगाड़े, रणसिंगा,दुमानू आदि बाजे बजाते है एवं उसके पीछे लोकप्रिय तीर-कमानो का खेल "ठोडा", नृत्य दल, स्थानीय नृत्य प्रदर्शन व अन्य सांस्कृतिक झलकियाँ दिखाई देती हैं।  यह मेला पूर्णमासी तक चलता रहता है। 

अभी हम मंदिर में दर्शन करके बाहर निकले थे तभी वहाँ किसी बंदे ने हमें बताया हरिपुर धार का रास्ता बर्फ़बारी के कारण बंद है। हम सोच रहे थे कि 6 बजे तक हम हरिपुर धार पहुँच जायेगें। हमने जल्दी से वहाँ परांठे खाये। (जो मैं पटियाला घर से ले कर चला था।) और हरिपुर की तरफ चल दिए। हरिपुर धार रेणुका जी से 60 KM की दुरी पर है।  

अगले भाग में बताऊँगा कैसे हम बर्फ से रास्ता बंद होने के बाबजूद  हरिपुरधार पहुंचे। जबकि पर्यटक रास्ता बंद होने के कारण वापिस अपने घर को जा रहे थे। 

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किले को जाता हुआ रास्ता 







चारदीवारी के अंदर शिव मंदिर 



झरने के बीच में मंदिर 

परशुराम ताल 

मंदिर को जाता रास्ता 



शिला जहाँ बैठ कर परशुराम जी ने तप किया था। 

परशुराम जी 





रेणुका जी झील 

मंदिर के पास लिया गया फोटो 


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