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Saturday, 14 May 2016

मणिमहेश कैलाश यात्रा -- भाग - 2

इस यात्रा को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। 

सुबह हम 5.30 बजे हम अगले पड़ाव हड़सर की तरफ चल पड़े। भरमौर से हड़सर 9 km की दुरी पर है। 20 मिनट में हम हड़सर पहुँच गए। हड़सर आखिरी पड़ाव है, इस के आगे 14 km यात्रा पैदल करनी होती है। किसी जमाने में यह यात्रा पैदल चम्बा से आरम्भ की जाती थी। सड़क बन जाने के कारण ये यात्रा भरमौर से आरम्भ होती रही और अब यह स्थारण तौर पर यात्रियों के लिए यह यात्रा हड़सर से शुरू होती है। लेकिन यहाँ के स्थानीय ब्राह्मणों-साधुओं द्वारा आयोजित परंपरिक छड़ी यात्रा आज भी प्राचीन परम्परा के अनुसार चम्बा के लक्ष्मी नारायण मंदिर से आरम्भ होती है। 


हड़सर के बारे में 
 
हड़सर में सिवाय शिव मंदिर और मणिमहेश यात्रा का एक पड़ाव होने के इलावा कोई तीर्थ स्थान नहीं। हड़सर का नाम कैसे पड़ा होगा इसके बारे में तो नहीं बताया जा सकता, लेकिन हड + सर से यही मतलब निकाला जा सकता है कि यह स्थान पहले मृतकों की अस्थियां प्रवाहित करने का स्थान रहा होगा। बुड्डल नाले में पुराने लोग अस्थियां प्रवाहित करते होंगे। इस कारण इसे हड़सर कहा जाने लगा होगा। 

सुबह 6 बजे के करीब हम ने नदी की तरफ से भोले का नाम ले कर पैदल यात्रा शुरू कर दी। हड़सर से मणिमहेश की चढाई तक़रीबन 15 km है। अभी चढाई शुरू ही की थी कि पोनी पोर्टर वाले हम से घोड़े पर बैठने और समान उठाने के लिए कहने लगे। हड़सर में ही पोनी और पोर्टर मिल जाते हैं। पोनी पोर्टर वालों को जिला मजिस्ट्रेट ने पहचान पत्र जारी किये हुए हैं। हम ने एक पोर्टर कर के उस को अपने बैग दे दिए और आगे चल दिए। आधा कि.मी. चलने के बाद हमे गुई नाला खड्ड में पहला भंडारा पंजाब के लहरगगघा वालों का मिला जिसे भाई के साडू साहिब द्वारा लगाया गया था। इस यात्रा में भंडारा लगाने के लिए वो दो महीना पहले तैयारी शुरू कर देते हैं और 20 दिन यहाँ पर अपना बिज़नेस छोड़ कर यात्रियों की सेवा में लग जाते हैं। दो साल पहले मेरा भी प्रोग्राम बन गया था इन के साथ यहाँ लंगर में सेवा करने का, पर बिलकुल मौके पर जा नहीं सका। खैर हम ने यहाँ चाय पी। इतना तो तय था कि माया जी आगे पैदल नहीं जा पाएंगी। तो उनके लिए यहीं से पोनी का इंतजाम किया गया। अंजू जी का तो पूरा मन था पैदल यात्रा का, लेकिन माया जी के कारण उनको भी पोनी करना पड़ा। पिछली बार मैं इस यात्रा को पैदल पूरा नहीं कर पाया था। आखिर के चार कि.मी. मुझे पोनी पर करने पड़े थे। उस का भी एक कारण था क्योंकि पिछली बार चढाई वाले दिन मेरा व्रत था जिस कारण खाली पेट चढाई करनी पड़ी थी, दूसरा ट्रैकिंग करने के बेसिक रूल को फॉलो नहीं किया था। वो गलती थी, जब भी पानी पीने के लिए रुकता पेट भर पानी पिया । जबकि ट्रैकिंग करते हुए हमे सिप सिप कर के पानी पीना चाहिए।


अब की बार सोच रखा था कि इस यात्रा को पैदल ही पूरा करना है। दोनों को पोनी पर चढ़ा कर मैं पोर्टर के साथ 6.45 पर भोले की धुन में अपने पड़ाव की ओर चल पड़ा। रास्ता सुंदर नजारों से भरपूर था। रास्ते में छोटी छोटी दुकाने थी जिन में पानी, कोल्ड ड्रिंक और खाने पीने का समान था। लोग घोड़ो से और पैदल भोले नाथ का जयकारा लगाते हुए आगे बढ़े जा रहे थे। 10 बजे के करीब मैं इस यात्रा के अगले पड़ाव धणछो पहुँचा। धनछो तक का रास्ता आसान नहीं है। अगर बारिश हो जाये तो रास्ता ओर भी दुर्गम हो जाता है। लेकिन भक्ति के आगे ये सब कठिनाइयां कुछ भी नहीं होती। धौलाधार पर्वत, हरियाली युक्त बातावरण और मन में कैलाश पर्वत के दर्शनों के उमंग शिव भक्तों के मन में उल्हास पैदा कर देती है। यहाँ तक मैंने आधा रास्ता तय कर लिया था। इस रास्ते में नदी पर कई छोटे छोटे पुल भी आते हैं। वैसे तो पुरे रास्ते में भंडारे लगे रहते हैं, लेकिन धणछो में भंडारे बहुत ज्यादा मात्रा में लगे होते हैं।
धणछो एक बहुत ही सुंदर जगह है। इस जगह पर बहुत सारे टेंट लगे हुए थे। जहाँ लोग रात को रुक सकते हैं। यहाँ का मौसम भी ठंडा रहता है।

धणछो के बारे मे


धण + छोह के शब्दों से बना है। धण का अर्थ भेड़ बकरियाँ के रेवड़ को बोलते हैं और छोह चंबयाली भाषा में जल प्रपात को कहते हैं।  इसलिए ऐसा जल प्रपात जहाँ भेड़ बकरियाँ के रेवड विश्राम करते हो उसे धणछोह कहते हैं। यहाँ बहुत ऊँचा जल प्रपात है। जो काफी ऊंचाई से गिरता है। जिस की फुहार की धुंध काफी दूर तक जाती है। ऐसा कहा जाता है बाबा जय कृष्ण गिरी सहित अनेक ऋषि मुनियों ने यहाँ तपस्या की है।

धणछो से गौरी कुंड तक जाने के लिए दो रास्ते हैं। एक खड़ी चढाई वाला दूसरा घुमावदार पहाड़ी पर पथरीला रास्ता। दोनों ही रास्ते सांस फुलाने वाले। आगे का रास्ता और भी मुश्किल भरा है। आगे जा कर घराट नामक स्थान पर एक भीमकाय पहाड़ के अंदर से एक ऐसी आवाज आती है जैसे बहुत सारे जहाज एक साथ चल रहे हों। जैसे जैसे मैं ऊंचाई की तरफ बढ़ रहा था, रास्ता मुश्किल होता जा रहा था और ठण्ड भी बढ़ती जा रही थी। मेरा बैग पोर्टर ले कर आगे चला गया था। धीरे धीरे मैं आगे बढ़ते हुए सुंदरासी पहुंचा, जहाँ से मैंने पिछली बार हार मान कर आगे के लिए घोडा कर लिया था। यहाँ से अभी भी मणिमहेश का रास्ता 4 km का था। आगे का रास्ता ओर भी दुर्गम था। लेकिन अब की बार पैदल यात्रा करने की ठान रखी थी। जैसे जैसे आगे बढ़ रहा था, प्रकृति नज़ारे मन को मोह लेने वाले थे। धीरे धीरे मैं आगे बढ़ता रहा। अब मुझे और मेरे हाथों को ठण्ड लगनी शुरू हो गई थी। मेरा पोर्टर पता नहीं कहाँ रह गया था। मेरा जैकेट मेरे बैग में पड़ा था, जो उस के पास था। आखिर मैं 3.20 पर गौरी कुंड पहुँच गया। गौरी कुंड से  कैलाश के दर्शन सम्मोहित करने वाले थे। 

गौरी कुंड के बारे में 

कैलाश चोटी के नीचे एक बहुत बड़ा मैदान है। जिसको भगवान् शिव के क्रीड़ास्थल 'शिव का चौगान' के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है यहीं पर भगवान् शिव और देवी पार्वती क्रीड़ा करते हैं। यहाँ पर पानी से भरा एक कुंड है जिसे गौरी कुंड कहते हैं। यहाँ आ कर स्त्रियाँ स्नान करती हैं 

ये 7-8 km धनछो से गौरी कुंड तक मैंने 5 घंटे में पुरे किये। यही से एक रास्ता कमल कुंड को भी जाता हैयहाँ आ कर मेरी हिम्मत टूट सी गई थी। एक तो मुझे ठण्ड लग रही थी। दूसरा गौरी कुंड पर पहुँचने पर मौसम अचानक बदल गया। वहाँ बहुत तेज हवा चलने लगी और हलकी हल्की बूंदाबादी शुरू हो गई थी। मैंने एक दूकान में शरण ली। हवा और बारिश की वजह से ठण्ड और लग रही थी। मन में विचार आया कि आज की रात गौरी कुंड रुक जाता हूँ। थोड़ी देर बाद बारिश रुक गई मैं आगे बढ़ गया। 10 कदम आगे जाने पर मैं एक भण्डारे में रुक गया और गरमा गर्म चाय का आनंद लेने लगा। हवा अभी भी तेज थी। अभी मैं चाय पी ही रहा था अचानक मेरा पोर्टर मेरे पास आया। उसे देख मुझे बहुत ख़ुशी हुई। मैंने उस से अपना बैग लिया और उस में से जैकेट निकाल कर पहन ली। पोर्टर ने मुझे बताया उसे ऊपर अंजू जी और माया जी कही नहीं मिली। जिस कारण वो गौरी कुंड आ कर मेरी प्रतीक्षा करने लगा था। कुछ देर आराम कर हम 1.5 कि.मी. ऊपर मणिमहेश सरोवर की तरफ बढ़ गए। मेरे लिए एक एक कदम चलना मुश्किल हो रहा था। थकावट के कारण नींद भी आ रही थी। मेरा पोर्टर मेरा उत्साह बढ़ाता रहा और ऊपर से आने वाले यात्रियों के जयकारों के कारण मैं धीरे धीरे चलता हुए 5 बजे के करीब मणिमहेश सरोवर पहुँच गया। ऊपर पहुँच कर मणिमहेश पर्वत और सरोवर के दर्शनों से एक बार तो आँखें नम हो गई। मैंने भोले को मन ही मन धन्यावाद किया। 
 
थोड़ी देर वही पर आराम करने के बाद अभी हम अंजू जी और माया जी ढूंढने निकलने ही वाले थे कि अचानक अंजू जी मेरी तरफ आई और मुझे टेंट में गई, जो उन्होंने आते ही किराए पर ले लिया था। टेंट में जाते ही मैं लेट गया। लेटते ही मुझे नींद आ गई। 2 घंटे बाद मैं उठा। अँधेरा हो चूका था और ठण्ड भी पुरे जोरों पर थी। अंजू जी ने मुझे खाने के लिए कहा। लेकिन मुझे भूख नहीं लग रही थी। मैं उठ कर टेंट से बाहर आ गया। बाहर बहुत ही ज्यादा ठण्ड थी। मैं बाहर घूमने लगा। वहाँ पर एक भंडारा लगा हुआ था। मैं वहाँ गया और गर्म गर्म दूध पीया। कुछ यात्रीगण बाहर खड़े कैलाश को निहार रहे थे। कुछ साधुगण वहाँ आग जला कर बैठे हुए चिलम पी रहे थे। मैं उनके पास गया और आग सेकने लगा। मेरा मन था कि मैं रात उनके पास गुजारूं। ऐसी ही आधी रात मैंने खीर गंगा में एक साधु के सानिध्य में गुजारी थी। 10 मिनट के बाद ही मैं वहाँ से उठ गया। ज्यादातर यात्री अपने अपने टेंटो में थे। कुछ देर बाद मैं भी अपने टेंट में चला गया। टेंट में आ कर देखा माया जी की तबियत ठीक नहीं थी। उन्होंने कुछ भी नहीं खाया था। मैंने और अंजू जी ने उन्हें कुछ खाने को कहा और मैं बाहर आ कर भंडारे में गया और खाने की प्लेट ले कर माया जी को खाने को दी। माया जी को ठण्ड भी लग रही थी। मैं वापिस भंडारे में आया वहाँ पर डॉक्टर भी थे। वही पर एक बजुर्ग और एक 15 साल के लड़के की तबियत बहुत ज्यादा खराब थी। डॉक्टर उनका काफी ध्यान रख रहे थे। उन्हें गर्म दूध दिया जा रहा था। बाहर सच में बहुत ठण्ड थी। ऑक्सीजन की कमी भी थी। मैंने माया जी के लिए दवाई ली और वापिस आ कर उन्हें दवाई दे दी। एक बार टेंट में जाने के बाद बाहर निकलने का दिल नहीं करता था। कई लोग रात को मणि देखने के लिए सारी रात बाहर इन्तजार करते हैं

जय मणिमहेश

हिमाचल पर्यटन विभाग द्वारा प्रकाशित प्रचार-पत्र में इस पर्वत को ”टरकोइज माउंटेन” लिखा है। टरकोइज का अर्थ है नीलमणि। यूं तो साधारणतया सूर्योदय के समय क्षितिज में लालिमा छाती है और उसके साथ प्रकाश की सुनहरी किरणें निकलती है। लेकिन मणिमहेश में कैलाश पर्वत के पीछे से जब सूर्य उदय होता है तो सारे आकाशमंडल में नीलिमा छा जाती है और सूर्य के प्रकाश की किरणें नीले रंग में निकलती हैं जिनसे पूरा वातावरण नीले रंग के प्रकाश से ओतप्रोत हो जाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि इस कैलाश पर्वत में नीलमणि के गुण-धर्म मौजूद हैं जिनसे टकराकर प्रकाश की किरणें नीली रंग जाती हैं। आमतौर पर इस की तुलना शिवजी जी के गले में लिपटे  नाग की मणि के रूप में भी की जाती है। मुख्य स्नान वाले दिन इस मणि के दर्शन अवश्य होते हैं

कैलाश पर्वत के शिखर के ठीक नीचे बर्फ से घिरा एक छोटा-सा शिखर पिंडी रूप में दृश्यमान होता है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह भारी हिमपात होने पर भी हमेशा दिखाई देता रहता है। इसी को श्रद्धालु शिव रूप मानकर नमस्कार करते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार वसंत ऋतु के आरंभ से और वर्षा ऋतु के अंत तक छह महीने भगवान शिव सपरिवार कैलाश पर निवास करते हैं और उसके बाद शरद् ऋतु से लेकर वसंत ऋतु तक छ: महीने कैलाश से नीचे उतर कर पतालपुर में निवास करते हैं। इसी समय-सारिणी से इस क्षेत्र का व्यवसाय आदि चलता था। शीत ऋतु शुरू होने से पहले यहां के निवासी नीचे मैदानी क्षेत्रों में पलायन कर जाते थे। और वसंत ऋतु आते ही अपने मूल निवास स्थानों पर लौट आते थे। श्रीराधाष्टमी पर मणिमहेश-सरोवर पर अंतिम स्नान इस बात का प्रतीक माना जाता है कि अब शिव कैलाश छोड़कर नीचे पतालपुर के लिए प्रस्थान करेंगे।

इसी प्रकार फागुन मास में पड़ने वाली महाशिवरात्रि पर आयोजित मेला भगवान शिव की कैलाश वापसी के उपलक्ष्य में आयोजित किया जाता है। पर्यटन की दृष्टि से भी यह स्थान अत्यधिक मनोरम है। इस कैलाश पर्वत की परिक्रमा भी की जा सकती है, लेकिन इसके लिए पर्वतारोहण का प्रशिक्षण व उपकरण अति आवश्यक हैं।

कैलाश पर्वत को भगवान् शंकर का शरीर माना जाता है जिस पर चढ़ना अशुभ होता है आप को ये सुन कर यकीन नहीं होगा बर्फ से ढके रहने वाले इस पौराणिक पर्वत पर जिस ने भी चढ़ने की कोशिश की वो पत्थर का बन गया। स्थानीय निवासियों के अनुसार एक बार एक गड़रिया अपनी भेड़ों के साथ इस पर्वत पर चढ़ने लगा। लेकिन जैसे जैसे वो ऊपर की चढ़ता गया उस की भेड़े पत्थर की बनती गई। उस के बाद भी गड़रिया ऊपर चढ़ने से ना रुका तब वो शिला में तबदील हो गयायह भी कहा जाता है वर्ष 1968 में एक पर्वतरोही ने इस पर चढ़ने की कोशिश की, लेकिन वो सफल ना हो सका। आज भी इस पर्वत की चोटी पर चढ़ने की कोई हिम्मत नहीं जुटा पाया है 



                                                      
अगले दिन सुबह जल्दी आँख खुल गईबाहर अभी अँधेरा थानित्य कर्म से फारिग हो कर हम नहाने के लिए झील की तरफ चल पड़ेअंजू जी और माया जी स्त्रियों के लिए झील पर बने अलग से कुंड में चले गएबाहर काफी ठण्ड थी। झील के पानी में बर्फ जमी हुई देख कर ठण्ड और भी लगने लगी। शिव भक्त ठन्डे पानी में स्नान कर भोले के जयकारे लगा रहे थे। मैंने भी हिम्मत कर झील के पास रखी बाल्टी से झील से पानी भर अपने ऊपर डाल दिया। एक बार तो ठन्डे पानी से ऐसा लगा जैसे शरीर जम गया हो। फटाफट मैंने 3 बाल्टी पानी की और डाल कर कपड़ों की तरफ दौड़ा। जल्दी जल्दी मैंने अपने कपडे पहन कर तैयार हो गया। तैयार हो कर हम तीनो ने झील की परिक्रमा की। फिर हम इंतज़ार करने लगे उस पल की जिसके लिए हम सब आये थे। अंजू जी और माया जी झील के पास खड़े हो गए। मैं झील की दूसरी तरफ पहाड़ के ऊपर चढ़ गया। सभी शिव भक्त उस अदभुत दृश्य को देखने के लिए खड़े थे और भोले के जयकारे लगा रहे थे। जैसे ही कैलाश शिखर पर सूर्य देवता की लालिमा पड़ी शिव भक्तों में जोश आ गया। मैंने कैमरे से वीडियो ऑन कर लियाजैसे ही सूरज देवता कैलाश के पीछे से दिखाई दिए। कैलाश का शिखर आधे चंद्रमा के आकार में आ गया और वहां से एक दिव्य नीली रौशनी प्रगट हुई। जो सिर्फ कुछ सेकंड के लिए थी, फिर वो दिव्य रौशनी सूरज के प्रकाश में समा गई। वो दिव्य दर्शन देख कर कुछ पल तो मैं वही पर खड़ा रह गया। फिर भोले को प्रणाम कर उन के सामने नतमस्तक हुआ। कुछ यादगार फोटो ले कर मैं पहाड़ से नीचे उतर कर अंजू जी और माया जी के पास आ गया। माया जी की तबियत अब ठीक लग रही थी। 

        मणिमहेश सरोवर 

पौराणिक कथाओं में यह झील भगवान् शिव की धरती मानी जाती थीएक किंवदंती के अनुसार भगवान् शिव माता पार्वती के साथ विवाह उपरांत सभी देवगणों के साथ यहाँ पधारे थेकैलाश चोटी से ठीक नीचे से मणिमहेश गंगा का उद्गम होता हैइस का कुछ अंश झील से होकर झरने के रूप में बाहर निकलता है। झील में स्नान कर इस पवित्र झील की परिक्रमा कर वहां संगमरमर निर्मित भगवान् शिव की चौमुख मूर्ति की पूजा की जाती हैराधाष्टमी वाले दिन जब सूरज की किरणे जब कैलाश शिखर पर पड़ कर झील पर पड़ती हैं तो झील का पानी अमृत समान हो जाता है। तब स्नान करने से पापों और अनेक रोगों से मुक्ति मिल जाती हैध्यान देने योग्य बात है कि कैलाश के साथ सरोवर का होना सर्वव्यापक है। तिब्बत कैलाश के साथ मानसरोवर, आदिकैलाश मे पार्वती कुंड और भरमौर के कैलाश साथ मणिमहेश सरोवर। इसी मणिमहेश सरोवर से पूर्व दिशा में स्थित विशाल और गगनचुम्बी नीलमणि के  गुण से युक्त कैलाश पर्वत के दर्शन होते हैं सरोवर के किनारे स्थापित शवेत पत्थर की शिवलिंग रूपी मूर्ति (जिसे छठी शताब्दी का बताया जाता है।) पर हम अपनी श्रद्धापूर्ण पूजा करते हैं

उस के उपरान्त हम ने सरोवर के किनारे शिव मूर्ति पर पूजा की और वापिसी के सफर के लिए तैयारी करने लगे। कई यात्री सरोवर का जल अपने साथ ले कर जाते हैं हमारा पोर्टर हमारे पास आ गया था। उस ने हमारा समान उठाया और भोले नाथ के जयकारे के साथ हम नीचे उतरने लगे। माया जी इस बार पैदल ही नीचे उतरने का निर्णय लिया। पोर्टर को भी हिदायत दे दी गई कि वो साथ साथ रहे। धीरे धीरे हम गौरी कुंड आ गए। यहाँ से इस बार हम ने दूसरे रास्ते से नीचे जाने का निर्णय किया। मैं पिछली बार भी इसी रास्ते से नीचे गया था। ये रास्ता आगे जा कर धनछो मिलता हैमाया जी के कारण हम धीरे धीरे नीचे उतर रहे थेथोड़ी दुरी तक तो ये रास्ता ठीक है लेकिन उस के बाद ये पूरा रास्ता पत्थरो के कारण पथरीला हो जाता है। हर कदम ध्यान से रखना पड़ता है। बहुत ही कम लोग इस रास्ते से आ जा रहे थेसब से जरुरी बात इस रास्ते में आप को कहीं भी भंडारा नहीं मिलेगा और एक दो दूकान है रास्ते में, वो भी ऊँचे दामों में समान बेचते हैं यात्रियों को। मेरी राय में हमे इस रास्ते से ना तो ऊपर चढ़ना चाहिए ना ही नीचे उतरना चाहिए धनछो से आधा km पहले ही हल्की हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गई। अंजू जी और माया जी वही बैठ गए। मैं जल्दी से नीचे उतर कर धनछो आ गयाबारिश अब तेज हो गई थी। मैंने वही एक भंडारे में रुक कर भंडारे का आनंद लिया और बारिश रुकने का और अंजू जी और माया जी का इन्तजार करने लगाहमारा पोर्टर भी वहां आ गया। मैंने उस से उन दोनों के बारे में पूछा तो कहने लगा बारिश के कारण वो वही बैठी थी। अब बारिश भी कम हो गई थी। पोर्टर को उनके साथ आने को बोल कर नीचे उतरने लगा हल्की हल्की बूंदाबांदी अभी भी हो रही थी 

उतराई हमेशा ही मेरी कमजोरी रही है। पता नहीं क्यों चढाई मुझे ज्यादा पसंद है उतरने से। बारिश के कारण उतराई और भी मुश्किल हो गई थीहर कदम ध्यान से रखना पड़ रहा था। फिसलन और उतराई की कठिनता को देख कर मुझे माया जी की चिंता होने लगी। धीरे धीरे उतरते हुए मेरा भी मनोबल टूटने लगा। थकान और प्यास के कारण हिम्मत जबाब देने लगी। जितना ज्यादा पानी पी रहा था उतने ही ज्यादा होंठ और गला सुख रहा था। एक बार तो ऐसा हुआ आधा कि.मी. तक कोई पानी नहीं था और प्यास के कारण चलना मुश्किल हो रहा था। किसी तरह गिरता पड़ता मैं अपने जान पहचान वालों के भंडारे तक पहुंचा। वहाँ पहुँच कर एक तरह से मैं गिर ही गया थाएक मिनट आराम करने के बाद मैंने 2 गिलास निंबु पानी पिया। उस के बाद मैं लेट गया। कपडे गीले होने के कारण थोड़ी देर बाद मुझे ठण्ड लगने लगीतब उन्होंने मुझे भंडारे में बने अलग सी जगह में बिस्तर लगा कर तीन कम्बल दे दिए। लेटने के बाद मुझे झट से नींद आ गईएक डेढ घंटे बाद अंजू जी और माया जी भी आ गए। माया जी की हालत बहुत खराब थीआखिरी का आधा कि.मी. वो लोगों की सहायता से ही नीचे उतर सकी। मुझे ये सुन कर अपने आप पर गुस्सा आने लगा कि मैं उन को छोड़ कर अकेला ही नीचे उतर आया। खैर भंडारे वालों ने दोनों के लिए बिस्तर का इंतज़ाम कर दिया। दोनों आराम करने लगे। थकावट के कारण नींद बहुत ही जबरदस्त आई। अगले दिन सुबह सुबह उठ कर नीचे उतरने के लिए हम तैयार हो गए। सुबह सुबह शिव भजन और आस पास का माहौल से ऐसा लग रहा था जैसे सारी सृष्टि शिवमय हो गई हैभंडारा वालों ने हमे भोले शंकर का प्रशाद दे कर हमें विदा किया। माया जी को चलने में दिक्कत आ रही थी। चलने पर उनके घुटने में दर्द हो रहा था। हमारा पोर्टर भी तब आ गया था। उस ने हमारा समान ले लिया और माया जी को एक घोडा करवा दिया जिस से वो आराम से नीचे उतर सकें। बड़े आराम से हम हड़सर पहुँच गए। हड़सर पहुँच कर हम ने अपने टैक्सी वाले को फ़ोन कर बुला लिया और वापिस भरमौर की तरफ चल पड़े। वापिसी में हम चम्बा में प्रसिद्ध लक्ष्मी नारायण जी के मंदिर को देखते हुए और खजियार देखते हुए एक रात डलहौज़ी में व्यतीत की और अगले दिन अंजू जी और माया जी को मैंने अम्बाला से दिल्ली की बस चढ़ा कर मैं पटियाला आ गया। 

मेरे कुछ घुमक्कड़ मित्र इस यात्रा को यात्रा के समय ना कर के पहले या बाद में करते हैं। क्या उनका मकसद सिर्फ मणिमहेश झील तक जा कर वापिस आना है? लेकिन मेरा मानना है कि कुछ तो महत्ता होगी जिस से ये यात्रा सिर्फ कृष्णाष्टमी से राधाष्टमी तक चलती है। क्यों 5 से 7 लाख लोग सिर्फ इन 15 से 20 दिन की यात्रा के समय ही आते हैं मेरे कुछ घुमक्कड़ मित्र भीड़ को भी एक कारण बता कर इसे पहले या बाद में करने को कहते हैं। मेरा मानना है चाहे आप यात्रा के समय आये हुए हैं या यात्रा के पहले या यात्रा के बाद, अगर आप ने मणिमहेश आ कर मणि के दर्शन नहीं किये तो इस यात्रा को आप को बार बार करना चाहिए और तब तक करने चाहिए जब तक आप को मणि के दर्शन ना हो


जिस तरह से अंजू जी ने माया जी की सारी यात्रा में सहायता की उस हिसाब से उन की तारीफ़ तो बनती है। माया जी भी बहुत हिम्मती महिला हैं। शरीरक कष्ट होने के बाबजूद भी उन्होंने इस यात्रा को पूरा किया भोले शंकर को धन्यवाद करते हुए मैं इस यात्रा को यहीं समापत करता हूँ कि भोले बाबा ने निर्विघ्न इस यात्रा को पूरा करवाया। मुझे तो यही लगता है कि वो ड्राइवर के रूप में या फिर पोर्टर के रूप में हमारे साथ चल कर हमारी यात्रा को पूरी करवा रहे थे 




चढाई वाला रास्ता 







धनछो 


चढाई का रास्ता 
ऊपर से धनछो 






गौरी कुंड 

गौरी कुंड से मणिमहेश कैलाश 


टैंट के अंदर अंजू जी और माया जी 


नजदीक से पिंडी के दर्शन 

मणिमहेश सरोवर 

सरोवर के किनारे रंगबिरंगे टेंट 




कैलाश के पीछे सूरज देवता प्रगट होते हुए। 

नीचे गौरी कुंड का दृश्य 









वापिसी के समय कैलाश 



पथरीला रास्ता 

लहरगग्गा वालों का भंडारा जहाँ हम रात को रुके थे। 


हड़सर यही से चढाई शुरू होती है। 



चम्बा में लक्ष्मी नारायण जी का मंदिर। 

खजियार 
 


 

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