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Saturday, 23 April 2016

मणिमहेश कैलाश यात्रा - भाग - 1

देश की ज्यादातर पहाडि़यों में कहीं न कहीं शिव का कोई स्थान मिल जाएगा, लेकिन शिव के निवास के रूप में सर्वमान्य कैलाश पर्वत के भी एक से ज्यादा प्रतिरूप पौराणिक काल से धार्मिक मान्यताओं में स्थान बनाए हुए हैं। तिब्बत में मौजूद कैलाश-मानसरोवर को सृष्टि का केंद्र कहा जाता है। वहां की यात्रा आर्थिक, शारीरिक व प्राकृतिक, हर लिहाज से दुर्गम है। उससे थोड़ा ही पहले भारतीय सीमा में पिथौरागढ़ जिले में आदि-कैलाश या छोटा कैलाश है। इसी तरह एक और कैलाश, मणिमहेश कैलाश हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिले में है।

मणिमहेश-कैलाश

धौलाधार, पांगी व जांस्कर पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा यह कैलाश पर्वत मणिमहेश-कैलाश के नाम से प्रसिद्ध है और हजारों वर्षो से श्रद्धालु इस मनोरम शैव तीर्थ की यात्रा करते आ रहे हैं। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिला के भरमौर में स्थित मणिमहेश को तरकोर्डज माउंटेन के नाम से भी पुकारा जाता है। जिसका का अर्थ है नीलमणि। कहा जाता है समुद्र तल से 18564 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित मणिमहेश को भगवान् शिव और माँ पार्वती का निवास स्थान माना जाता है। यहां मणिमहेश नाम से एक छोटा सा पवित्र सरोवर है जो समुद्र तल से लगभग 13,500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। इसी सरोवर की पूर्व की दिशा में है वह पर्वत जिसे कैलाश कहा जाता है। मणि महेश में हर वर्ष भाद्रपद मास में कृष्णाष्टमी और राधाष्टमी को मेला लगता है।


मणिमहेश कैलाश की यात्रा मैंने पहले भी अपने परिवार के साथ की हुई है। इस यात्रा के पीछे एक कहानी है। 2010 में मेरे भाई के साडू साहिब जो हर साल मणिमहेश में भंडारा लगाते हैं, वो घर पर आये भंडारे के लिए पर्ची कटवाने। मैंने भंडारे के लिए पर्ची कटवा दी। उन्होंने मुझे मणिमहेश की प्यारी सी मूर्ति दी। पता नहीं उस मूर्ति को देखते ही क्या हुआ, अंदर से एक आवाज आई चलो मणिमहेश भोले के निवास स्थान। एक महीने बाद चल पड़ा भोले के दर्शन के लिए अपने परिवार के साथ। उस के बाद तो लत लग गई भोले के स्थान देखने की। 2011 में केदारनाथ, बदरीनाथ, 2012 तुंगनाथ,2014 में कैलाश मानसरोवर और 2015 में फिर से मणिमहेश। कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान साथ में जो यात्रीगण थे उनमे से कइयों ने मणिमहेश जाने की इच्छा जताई, मैंने उन्हें बताया कि मैंने ये यात्रा की हुई है। तो उन्होंने मुझे ये यात्रा करवाने के लिए बोला। मैं भी एक दम से यात्रा के लिए तैयार हो गया। यात्रा शुरू होने से एक महीने पहले सब को बोल दिया तैयार हो जाओ भोले के दर पर जाने के लिए। हम 6 जनो के जाने का प्रोग्राम बना जो बाद में सिर्फ 3 जन का ही रह गया।  मैं, अंजू जी और माया जी (दोनों दिल्ली से)। मेरा इस बार मणिमहेश पर्वत की परिक्रमा करने का मन था। लेकिन वो हो ना सकी। हम ने 13.09.2015 को शाम को पटियाला से चलना तय किया। अंजू जी और माया जी दोनों दिल्ली से बस से पटियाला आ गई। रात का खाना खा कर और आराम कर के हम पटियाला से टैक्सी के द्वारा रात को 9 बजे भोले के दर्शन हेतु मणिमहेश की तरफ चल पड़े। मुझे रात का सफर ही अच्छा लगता है। एक तो रात को ट्रैफिक कम होता है। दूसरा आप का एक दिन बच जाता है।

पटियाला से पठानकोट तक का 265 km का सफर पता ही नहीं लगा और ट्रैफिक भी कम था। पठानकोट से आगे शुरू हुआ पहाड़ी रास्ता। 25 km के बाद मुझे उल्टी की समस्या ने घेर लिया। उस के बाद तो अगले 2 घंटे में 3-4 बार गाड़ी को रुकवाना पड़ा उल्टी के लिए। उल्टी की गोली लेने के बाद सोने की कोशिश की गई। जिस से उल्टियाँ आगे तंग ना करें। हम सुबह 6.15 पर पठानकोट से 145 km आगे बग्गा (जिला ऊना) नामक स्थान के पास रुके। वहां पर दूकान के पास मणिमहेश यात्रियों के लिए चाय का भंडारा लगा हुआ था। इस यात्रा में पठानकोट से ही लंगर शुरू हो जाते हैं। हम सब ने कार से निकल कर चाय पी। यहाँ से भरमौर 35 km है। हम 7.30 के करीब भरमौर पहुँच गए।

भरमौर के बारे में

भरमौर बुधील घाटी में 7000 फ़ीट ऊंचाई में स्थित है। यह अपनी प्राकृतिक सुंदरता और प्राचीन मंदिरों के लिए जाना जाता है। भरमौर की आस पास की समस्त भूमि में भगवान् शिव का निवास है। भरमौर का प्राचीन नाम ब्रह्मपुर था। इस स्थान को राजा मरु देव ने 530 ई. में अपनी राजधानी बनाया था और राज्य का नाम ब्रह्मपुर रखा। लगभग पांच सौ वर्षों तक यह ब्रह्मपुर नामक राज्य की राजधानी रहा। दसवीं शताब्दी में राजा साहिल वर्मा ने राज्य के विस्तार के साथ साथ चम्बा को अपनी राजधानी बनाया। अपनी जातीय परंपराओं, संस्कृति और प्राचीन इतिहास के साथ-साथ, भरमौर दिव्य वैभव की पूर्णता का निर्माण करती है।


भरमौर मणिमहेश यात्रा का प्रवेश द्वार या पहला पड़ाव कह सकते हैं। कुछ देर रुक कर फ्रेश हो कर हम भरमाणी माता के मंदिर की तरफ चल पड़े। भरमाणी माता के मंदिर जाने के दो रास्ते हैं। एक 3 km का पैदल रास्ता है। दूसरा रास्ता तक़रीबन 6 km का है। जहाँ पर 100 रुपए में आने जाने का टैक्सी द्वारा जाया जा सकता है। क्योंकि हम ने मणिमहेश की चढाई पैदल करनी थी, तो हम ने तय किया कि भरमाणी माता के मंदिर हम पैदल ही जायेंगे। तक़रीबन 9 बजे हम ने भरमाणी माता के दर्शन के लिए प्रस्थान किया। मणिमहेश से जाने से पहले भरमाणी माता के दर्शन करना जरुरी है नहीं तो यात्रा पूरी नहीं मानी जाती। भरमाणी माता का रास्ता मलकोता गाँव के बीच में से हो कर जाता है। हम तीनो उस सुंदर से गाँव की गलियों से निकलते हुए माता के मंदिर की तरफ चलते जा रहे थे। मंदिर की तरफ जाते हुए मैंने महसूस किया कि माया जी को चलने में मुश्किल हो रही है। अंजू जी उन का हाथ पकड़ कर उन्हें चढाई में सहयोग कर रही थी। धीरे धीरे हम चढाई चढ़ते हुए और आस पास के नज़ारे को देखते हुए हम 11 बजे के करीब माता के मंदिर पहुंचे। पूरा स्थान चीड़ और देवदार के पेड़ों से भरा हुआ है।

भरमाणी माता के बारे में

भरमाणी माता भरमौर के लोगों की सरंक्षक देवी है। उन्हें माँ दुर्गा का अवतार भी माना जाता है। इस  भूमि पर पहले भरमाणी देवी रहती थी। उस समय यहाँ पर जंगल हुआ करता था। एक दिन 84 सिद्ध भगवान शिव के साथ कैलाश कैलाश जाने के लिए भरमौर से गुजर रहे थे। उस समय भरमाणी माता वहाँ नहीं थी। भगवान् शिव ने 84 सिद्धों के साथ वहाँ पर अपना डेरा डाल लिया। शाम को जब माता भरमाणी जब आई तो उन्होंने अवधुत योगी को धूनी रमाए देखा। वो गुस्से में आ गई और वहाँ से चले जाने को कहा। तब भगवान् शिव ने कहा उन्हें रात को ठहरने दिया जाये, सुबह वो अपने आप बिना कोई नुक्सान पहुंचाए यहाँ से चले जाएंगे। 84 सिद्ध माता भरमाणी के व्यवहार से क्रोधित हो गए उन्होंने रातो रात मंदिर परिसर शिवलिंगो से भर दिया और मणिमहेश लिंग की स्थापना कर कैलाश के लिए आगे बढ़ गए। जब  माता भरमाणी  ने सुबह  परिसर में शिव लिंग देखे तो गुस्से से आग बबूला हो गई, जो बाद में भोले शंकर के आश्वासन के बाद शांत हुई। भोले नाथ के कहने पर ही माता नए स्थान पर रहने के लिए तैयार हुईं। उन्हें शिव जी से वरदान मिला कि जो भी यात्री मणिमहेश यात्रा में आयेगा उसे भरमाणी माता के मंदिर पहले आना होगा, नहीं तो उस की यात्रा सम्पूर्ण नहीं मानी जाएगी। ऐसी मान्यता सदियों से प्रचलित है। 

मंदिर तक पहुँचने से पहले वहाँ पर खाने पीने और प्रशाद की दुकाने खुली हुई थी। मंदिर के पास पहुँच कर हम ने वहाँ स्नान किया। मैंने वहां पर बने छोटे से कुंड में स्नान किया। पानी बहुत ही ठंडा था। लोग उस कुंड को तैर कर पार कर रहे थे। लेकिन पानी ठंडा होने के कारण मेरी हिम्मत ही नहीं हुई उस कुंड में जाने की। मैंने बाहर से ही एक बाल्टी से जल्दी जल्दी 3-4 बाल्टी पानी की अपने ऊपर डाल ली। तैयार हो कर हम ने माता के सुंदर रूप के दर्शन किये। दर्शन करने के बाद वही पर हम लोगो ने भंडारा खाया। भंडारा खाने के बाद जैसे ही हम वापिस चलने लगे तो माया जी ने पैदल चलने से मना कर दिया। अंजू जी और मैंने तय किया कि हम वापिस टैक्सी से चलते हैं। वही थोड़ी देर इंतज़ार करने के बाद हम टैक्सी से नीचे भरमौर आ गए। 

कहा जाता है कि भरमौर से भरमाणी माता के लिए रोप-वे बनाने के लिए बात चल रही है। राजनितिक दलों के नेता भी रोप-वे बनाने की घोषणाएं कर चुके हैं। देखो कब बनता है रोप-वे। वापिसी में टैक्सी वाला रास्ता बहुत ही खराब और कच्चा था। माया जी का टैक्सी से आना से एक बात तो तय थी कि वो मणिमहेश की चढाई पैदल तो नहीं करने वाली। 2 बजे हम भरमौर में थे। मेरा मन था कि हम आज ही हड़सर जा कर चढाई शुरू कर देते और एक किलोमीटर ऊपर हमारे जान पहचान वालो ने भंडारा लगा रखा था वही रात गुजारी जाये। पिछली बार जब मैं अपने परिवार के साथ आया था तब मैंने ऐसा ही किया था। खैर भरमौर आ कर हम ने एक होटल में दो कमरे लिए और 2 घंटे आराम किया गया। शाम को हम भरमौर की शान चौरासी मंदिर देखने चल दिए। चौरासी मंदिर शहर के केंद्र में स्थित है। भरमौर के लोगों का जीवन इन 84 मंदिरों के परिसर के आस पास ही केंद्रित है। चौरासी मंदिर के पास ही हेलिपैड बना हुआ है हेलीकाप्टर सेवा भरमौर से गौरी कुंड तक चलते हैं। 

चौरासी मंदिर के बारे में 


चौरासी मंदिर का नाम इस के परिसर में स्थित 84 छोटे बड़े मंदिरों के आधार पर रखा। पौराणिक कथाओं के अनुसार 84 योगियों ने ब्रह्मपुरा के राजा साहिल वर्मन के समय भ्रमण करते हुए आये थे। राजा वर्मन के आवभगत से अभिभूत हो कर योगियों ने राजा को 10 पुत्र रत्न की प्राप्ति का आशीर्वाद दिया था। राजा वर्मन ने 84 योगियों की याद में 84 मंदिरों का निर्माण करवाया था। तभी से इस को चौरासी मंदिर के नाम से जाना जाता है। एक दूसरी धारणा जो ऊपर भरमाणी माता के बारे में दी गई है। एक और मान्यता के अनुसार 84 योगियों ने देवी भरमाणी के प्रति सम्मान प्रगट नहीं किया तो उन्हें पत्थर में तब्दील कर दिया गया। यह पूरा मंदिर समूह उस समय की उच्च कला - संस्कृति का नमूना आज भी पेश करता है। चौरासी मंदिर का परिसर लगभग 7वी शताब्दी में बनाया गया। चौरासी मंदिर एक रमणीय, स्वच्छ और सुंदर दृश्य प्रदान करता है।


एक छोटे से बाजार से निकल कर हम शहर के केन्द्र में स्थित चौरासी मंदिर के परिसर में पहुंचे। सारा परिसर झालरों और रोशनियों से जगमगा रहा था। परिसर के आस पास छोटी बड़ी कई दुकाने थी। मंदिर परिसर में कई छोटे और बड़े मंदिर थे। एक तरह से सारा परिसर शिवमय बना हुआ था। मणिमहेश मंदिर (शिवा) 84 मंदिरों के केंद्र में खड़ा है। ये मंदिर यहाँ का प्रमुख मंदिर है। मंदिर के अंदर विशाल शिवलिंग बना हुआ है। इस के इलावा लक्षणा देवी मंदिर/भद्रकाली मंदिर बहुत पुराना है। कहा जाता है 680 AD में राजा मरू वर्मन ने इस मंदिर का निर्माण किया था। गणेश जी और नरसिम्हा मंदिर भी यहाँ के प्रमुख मंदिरों में आते हैं। इन सब के इलावा ख़ास तौर पर दो मंदिरों का जिक्र मैं जरूर करना चाहूंगा। 

नंदी बैल मंदिर मणिमहेश मंदिर के बिलकुल सामने ख़ास धातु से बने टूटे कान और पूंछ के साथ नंदी बैल जी की मूर्ति स्थित है। आमतौर पर हर शिव मंदिर के सामने नंदी बैल की प्रतिमा बैठी अवस्था में होती है, लेकिन यहाँ पर नंदी बैल की प्रतिमा चारों पैरों पर खडी अवस्था में है। कहा जाता है कि नंदी जी के पैरों के नीचे से रेंग कर निकल कर, फिर नंदी जी के कान में जो भी माँगो तो उसकी आवाज सीधी भगवान् भोले के पास जाती है। 

धर्मेश्वर महादेव मंदिर : एक अद्धभुत और बहुत ही सुंदर मंदिर है। राजा मरू वर्मन द्वारा धर्मेश्वर महादेव मंदिर में धर्मराज जी को उतरी (northern) कोने में एक सीट दी हुई है। इस मंदिर में एक खाली कमरा है जिसे चित्रगुप्त का कमरा माना जाता है। चित्रगुप्त जीवात्मा के कर्मो का लेखा जोखा रखते हैं। लोक कथाओं के अनुसार हर दिवंगत आत्मा को आगे बढ़ने के लिए धर्मराज की अंतिम अनुमति लेने के लिए यहाँ खड़ा होना पड़ता है। यहाँ पर मंदिर के पास कदमो के निशान बने हुए हैं। स्थानीय लोग इसे ढाई-पौड़ी कहते हैं, जिस का अर्थ है ढाई कदम। कहते हैं आत्माएं इन्ही क़दमों पर खड़ी होती हैं। चित्रगुप्त जीवात्मा के कर्मों का पूरा लेखा जोखा देते हैं।  फिर धर्मराज कर्मों के अनुसार आत्मा को अपना फैसला सुनाते हैं। एक तरह से यहाँ पर धर्मराज की अदालत लगती है। यह भी मान्यता है इस मंदिर के चारों तरफ स्वर्ण, रजत, तांबे और लोहे की अदृशय चार द्वार हैं। धर्मराज जी का फैसला आने के बाद यमदूत आत्मा को इन्ही द्वारों से आगे ले जाते हैं। गरूर पुराण में भी यमराज के दरबार में चार दिशाओं में चार द्वारों का उल्लेख किया गया है। पुजारी जी बताते हैं सदियों पूर्व यह मंदिर झाड़ियों से घिरा हुआ था। कोई भी इस तरफ आने की हिम्मत नहीं कर पाता था। पुजारी जी बताते हैं कि सब से पहले धर्मराज जी के मंदिर की पूजा होती है और चौरासी मंदिरों में स्थित सभी मंदिरों की पूजा समग्री भी इसी मंदिर से जाती है। स्थानीय लोगों का इस मंदिर में पूरा विश्वास है। यहाँ कई लोगो ने इन आत्माओं को महसूस भी किया हुआ है।
धर्मेश्वर महादेव 
हम ने भी सभी मंदिरों में भगवान् के दर्शन किये और इस मेले का आनंद लिया। मेरी नजर में चौरासी मंदिर देखने का असली मजा रात को ही है। दिन में वो बात नहीं होती। पिछली बार भी मैंने चौरासी मंदिर को अपने परिवार के साथ रात में ही देखा था। मंदिर परिसर से बाहर आ कर हम ने रात का भोजन किया और होटल में अपने कमरे में आ कर सो गए।

अगले भाग के लिए यहाँ क्लिक करें। 

सुबह सुबह बग्गा के सामने 

बग्गा में सुबह सुबह चाय 

रास्ते में हनुमान जी के दर्शन 

भरमौर का प्रवेश द्वार 

भरमाणी माता को जाते हुए अंजू जी और माया जी 

भरमाणी माता के जाते हुए गाँव की गलियाँ 

रास्ते से दिखते हुए नज़ारे 

ऐसी जगह घर हो तो क्या कहने 









सामने माता का मंदिर 

मंदिर से पहले दुकाने 


भरमाणी माता का मंदिर 



भरमाणी माता 



हेलिपैड 

चौरासी मंदिर में भोले नाथ का मंदिर 

मंदिर के अंदर शिवलिंग 

मंदिर की नक्काशी 

नंदी जी 



लक्षणा देवी जी 

 लक्षणा देवी जी का सुंदर मंदिर




परिसर में छोटे छोटे मंदिर 


नरसिंह मंदिर 

ये फोटो पहली यात्रा दौरान की है 


धर्मेश्वर महादेव 


पैरों के निशान जहाँ दिवंगत आत्माएं खड़ी होती हैं 

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