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Friday, 2 October 2015

कैलाश मानसरोवर यात्रा----अट्ठारहवाँ दिन --- एक दिन मानसरोवर में

 

कैलाश मानसरोवर के बारे में 

यह झील लगभग 320 वर्ग किलोमाटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इसके उत्तर में कैलाश पर्वत तथा पश्चिम मे राक्षसताल है। यह समुद्रतल से लगभग 4600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। झील गहरी परिधि में 55 मील (88 किलोमीटर) है और इस की औसत गहराई 90 मीटर है। 

हिन्दू धर्म में इसे पवित्र माना गया है। इसके दर्शन के लिए हज़ारों लोग प्रतिवर्ष कैलाश मानसरोवर यात्रा में भाग लेते है। हिन्दू विचारधारा के अनुसार यह झील सर्वप्रथम भगवान ब्रह्मा के मन से  उत्पन्न हुई थी। यह संस्कृत शब्द मानसरोवर, मानस तथा सरोवर को मिल कर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है - मन का सरोवर । यहां देवी सती के शरीर का दांया हाथ गिरा था। इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा जाता है। यहां शक्तिपीठ है।

 
बौद्ध धर्म में भी इसे पवित्र माना गया है। ऐसा कहा जाता है कि रानी माया को भगवान बुद्ध की पहचान यहीं हुई थी। जैन धर्म तथा तिब्बत के स्थानीय बोनपा लोग भी इसे पवित्र मानते हैं। इस झील के तट पर कई मठ भी हैं।


अब आगे। आज आराम से सो कर उठे। उठते ही देखा मानस के किनारे चीनी सैनिक अभ्यास कर रहे थे। दरअसल मठ के पास एक चीनी पुलिस चौंकी है। जल्दी से दैनिक क्रिया से निवृत हो गए। इस के बाद मानसरोवर किनारे चला गया। पानी काफी ठंडा था, मानसरोवर के सुबह के अलौकिक दृश्यों कि फोटो लेते रहे आज आसमान साफ़ था। कैलाश पर्वत की साफ़ दर्शन हो रहे थे, वापस आ कर कपडे निकाल कर मानसरोवर स्नान की  तैयारी करने लग गए। कुछ सहयात्री तो सुबह ही  नहा लिए थे। हम करीब 7.30 बजे नहाने गए। मैंने अपने परिवार के सभी सदस्यों के नाम से डुबकी लगायी ।

इस के  बाद  तैयार हो कर बाबा कैलाशनाथ की नेत्तृवः में होने वाले हवन में पहुंचे। आज सब के लिए बहुत ही ख़ास दिन था।  क्यों कि आज गुरु पूर्णिमा थी। सभी लोगो ने मिलकर गुरु पूर्णिमा वाले दिन  हवन की तैयारी की और मानसरोवर और कैलाश की समक्ष आहुतिया दी और प्रसाद ग्रहण किया।
  
भोजन के पश्चात आधे घंटे आराम करके हम पास में ही बनी मोनेस्ट्री में चले गए। बाहर से बिलकुल साधारण सी लगने वाली लकड़ी से निर्मित दुमंजिला मोनेस्ट्री अंदर से बहुत भव्य थी। सामने ध्यान-कक्ष में स्वर्ण-मूर्तियाँ विराजित थीं। एक दीपक जल रहा था। विलक्षण शांति पसरी हुई थी। कुछ देर आँखें बंद करके मन एकाग्र किया और ध्यान लगाया। बाहर आकर दूसरी मंजिल पर गए जहाँ लामा लोगों का निवास स्थान था।
 
कुछ यात्री रघु जी और केदार भाई वहाँ गेस्ट हाउस में तिब्बती के साथ बिलियर्ड्स खेलने लग गए।  मैंने उन के खेल का आनंद लिया और फिर से हम फिर से मानस के तट घूमने चले गए। वहाँ आगे जाने पर एक तिब्बती लड़की अपने बच्चे के साथ मानस किनारे बैठी थी।  उस का बच्चा बहुत ही प्यारा था।  मैंने झट से उसकी फोटो क्लिक कर ली उस के बाद हम मानस में बिखरे गोलाकार पत्थरों में ’ऊँ’ लिखे पत्थर ढूंढने लग गए। ॐ लिखे पत्थर तो हमें नहीं मिले फिर हम वही पत्थरों पर बैठकर मानस के रुप को निहारते रहे। सूर्य की किरणें और मानस की लहरें क्रीड़ा करते हुए सुंदर दृश्यावलि भेंट कर रहीं थीं। हम उन्हें देखने में खो गए। कई यात्री मानस में जल भरने जा रहे थे।  हम ने बोतलों में घर  के लिए मानस का पवित्र जल भरा। 
 
मानसरोवर के पानी में सूर्य प्रकाश जैसे पड़ रहा था, वैसे-वैसे पानी का रंग हरा, काला, सफेद दिखाई दे रहा था। शाम को मानस के किनारे भोले शंकर का ध्यान किया।  सच कहु तो वह 5 मिनट का ध्यान मन को असीम शान्ति प्रदान करने वाला था। मैंने अपने जीवन में इतनी सुन्दर, पवित्र झील आज तक नहीं देखी। एक बात और इतनी बड़ी झील और गंदगी का नामोनिशान नहीं। ना कोई लिफाफा, ना ही कोई कूड़ा कर्कट सच में चीन सरकार इस के लिए तारीफ़ की हकदार है। मेरे ख्याल में यही पवित्र झील अगर भारत में होती तो पहले धर्म के नाम पर इस के चारों तरफ दुकानें खुल जाती फिर गंदगी तो अपने आप आ जाती।  
 
रात्रि के  भोजन के बाद हम सभी जल्दी सो गए।  



मानसरोवर में स्नान 


पूजा पाठ का समान 




हवन करते हुए 





 




















गेस्ट हाउस के अंदर का दृश्य 













कोचर जी और छैना राम जी 
 
 
  
 
 
 
 
 
 

 
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