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Sunday, 13 September 2015

कैलाश मानसरोवर यात्रा ----पँद्रहवां दिन--दारचेन से यम-द्वार , डेरापुख


डेरापुख की ऊँचाई 5050 मीटर
यम द्वार की ऊँचाई 4810 मीटर 

कुल रास्ता : -  9 कि.मी  बस से + 12 कि.मी  पैदल 
पैदल समय: -  3 .30 घंटे लगभग 



मैंने अपने दूसरी पोस्ट में लिखा था हमारा 5th बैच सब बैचों से भाग्यशाली था। क्योकि एक तो इस समय तिब्बती कुंभ चल रहा था। जिस का मतलब था, कैलाश की एक परिक्रमा कई परिक्रमाओं  के बराबर थी। दूसरा एक सिर्फ हमारा ही बैच था। जिस में गुरु पूर्णिमा वाले दिन हम कैलाश मानसरोवर झील पर थे। तीसरा इस बैच के दिनों में सावन के दिन भी आते थे। मैं अपने आप को  बहुत ही भाग्यशाली मानता हूँ कि मेरा बैच चेंज नहीं हुआ और मैं इसी बैच में रहा।

सबेरे 5.30 बजे उठकर तैयार हो गया।  मैं अन्य यात्रियों के साथ बेल्ट-पाऊच कमर में बाँधकर साथ-लेजाने वाला बैग जिसमें आवश्यक कपड़ों के अतिरिक्त, खाने का सामान(ड्राई-फ्रूट्स इत्यादि जो घर से लाए थे ) एनर्जी-ड्रिंक, पानी की बोतल और बेंत लेकर  गेस्ट हाउस  से बाहर आ गया। अहाते में ही बस खड़ी थी। हम बस में जाकर बैठ गए। ठीक 7.30 बजे बस आगे यात्रा के लिए रवाना हुई। हमारी बस पहाड़ी कच्चे रास्ते से होकर आगे बढ़ रही थी। चारो तरफ सपाट बंजर भूमि नजर आ रही थी। दारचेन से 10 कि.मी. आगे जाने के बाद बस रूक गई उस समय सुबह 8.30 बजे थे, हमें बताया गया कि बस इसके आगे नहीं जाएगी, आगे का रास्ता पैदल एवं घोडे से तय करना होगा। सभी यात्री नीचे उतर आए। सामने एक छोटा सा मंदिर के आकार में द्वार बना था। गुरु ने बताया- “यह यम-द्वार है।

यम द्वार के बारे में

इस द्वार की परिक्रमा करके ही कैलाश की परिक्रमा प्रारंभ होती है। कहते हैं अगर आप इस की परिक्रमा कर के इस द्वार को पार करते हो तो मृत्यु-भय समाप्त हो जाता है। द्वार के इस ओर संसार है तो उस पार मोक्ष-धाम! लामा लोग यहाँ आकर प्राणांत होने को मोक्ष-प्राप्ति मानते हैं। इसलिए बीमार लामा अंतिम इच्छा के रुप में यहाँ जाते हैं और प्राण-त्यागते हैं।”

यम-द्वार के चारों तरफ रंग बिरंगी झंडियां लगी हुई थी। जिन के ऊपर तिब्बती मंत्र लिखे हुए थे।  उसके दोनों ओर छोटे-छोटे चबूतरे बने थे। लोग शरीर-त्याग के प्रतीक के रुप में अपने शरीर से बाल नोंचकर वहाँ अर्पित कर रहे थे। कुछ शिलाओं पर लिखा हुआ था जो बौद्ध-अनुयायियों के उपदेश बताए गए। द्वार के पार कैलाश-धाम अपने चरम सौंदर्य के साथ विधमान  थे। यही ‘‘यमद्वार” कहलाता है। मृत्यु के देवता यमराज के नाम से निर्मित यमद्वार को सभी यात्री पार कर परिक्रमा कर अर्थात मृत्यु के देवता के पास से सकुशल पार कर मोक्ष दाता भगवान शिव के निवास स्थल ‘‘कैलाश” पर्वत के परिक्रमा हेतु पोनी एवं पोर्टर के अलॉटमेंट का इंतज़ार करने लगे। यात्रियों के द्वारा अपनी-अपनी आवश्यकता अनुसार पोनी पोर्टर की मांग तकलाकोट में ही चीनी अधिकारियों को बता दी गई थी। उसी के अनुरूप यहां पोनी पोर्टर उपलब्ध थे। मैंने सिर्फ पोनी की  मांग की थी।

अभी हम सब आस पास की सुन्दरता को निहार ही रहे थे तभी प्रायवेट टूर वालों की जीप्सियाँ आगयीं और अनेक तीर्थ-यात्रियों के आने से भीड़ सी हो गई थी। 

हम सब एक नदी के किनारे के विस्तृत क्षेत्र में खड़े थे जहाँ बहुत सारे पोनी थे और तिब्बती पोर्टर। गुरु ने पोनी लेने वाले तीर्थयात्रियों की एक लाइन और पोर्टर लेने वालों की दूसरी लाइन लगवा दी, जिनको दोनों लेने थे उन्होंने अपने बैग पोर्टर वाली लाइन में रख दिए। :-) 

कुछ ही मिनटों में  गुरु ने ठेकेदार से नामों की पर्ची ले लीं और  नंबर से हरेक यात्री से एक-एक पर्ची उठाने को कहा जिस पर्ची पर जो नाम लिखा था वही उसका पोर्टर था। अधिकांश लड़कियाँ पोर्टर के रुप में थी। 
मैंने जब एक पर्ची निकाली और तिब्बती लड़की वेशभूषा में आँखों को छोड़कर सिर और चेहरे को पूरी तरह स्कार्फ़ से ढ़के हुए भागकर आयी और मेरा बैग और बेंत थाम कर मुझसे चलने का इशारा करने लगी। मैंने उसे ठहरने का इशारा किया। जिन यात्रियों ने केवल पोर्टर ही हायर किया था वे उनके साथ परिक्रमा पर चले गए, पर जिनको पोनी भी चाहिए था वे अभी भी अटके हुए थे। उसके बाद पुनः हमारी कैलाश परिक्रमा यात्रा प्रारंभ हुई।

मेरी पोनी वाली लड़की को  हिंदी या अंग्रेजी बिलकुल नहीं आती थी पर इशारे से अपनी बात समझा देती थीं। पोनी वाली लड़की को साथ ले चल मैं पैदल ही कैलाश परिक्रमा को निकल पड़ा। मैं प्रकृति के अद्भुत दृश्यों में खो गया था। आकाश गहरा नीला था, सूर्यदेव अपनी ऊष्मा उड़ेल रहे थे। दायीं ओर कैलाश-पर्वत अपनी श्वेत आभामय छवि के साथ दिव्य-दर्शन दे रहे थे, साथ में नंदी पर्वत उनके सौंदर्य की वृद्धि कर रहा था। बीच-बीच में हमें सामने से आते बौद्ध-अनुयायी परिक्रमा लगाते दिखायी दिए। वे हमसे विपरीत दिशामें चलकर परिक्रमा करते हैं। कुछ तो लेट-लेटकर परिक्रमा मार्ग पर जा रहे थे।
 

आगे जाने पर हमें कुछ टेंट लगे दिखाई दिए, मैं एक टीले पर बैठ गया । वहीं एक टैंट में बनी दुकान में  सारे पोनीवाले-और पोर्टर्स जा रहे थे। कुछ देर के बाद हम फिर से आगे चल दिए। 12.30 के करीब हम डेरापुख पहुँच गए। डेरापुख हमारा विश्राम-स्थल था। सभी यात्री अपने अपने कमरों में चले गए। कमरे में छः पलंग पर बिस्तर लगे थे। मैं अपने कमरे में पहुँच कर बिस्तर पर लेट गया। थकावट के कारण मेरी आँख थोड़ी देर के लिए लग गई।  हमारे कमरों के साथ ही चीनी सैनिकों की चौंकी थी। 

कुछ देर आराम करने के बाद मैं कमरे से बाहर आया और गुरु से मैंने टॉयलेट के बारे में पूछा। तो उसने सामने इशारा कर दिया। सामने पाँच फुट ऊँची मिट्टी से पुती एल आकार की बिना दरवाज़े की दीवार की ओट में तीन मीटर गहरे गड़्ढ़ों के ऊपर दो छिद्र कर रखे थे। उनमें नीचे और ऊपर हर जगह मल सड़ रहा था, शायद उनमें बहुत दिनों से सफ़ाई नहीं हुयी थी। मैं नाक बंद करके बाहर आ गया।  कैलाश परिक्रमा के तीन दिन दौरान टॉयलेट हमें गंदा ही मिला।

चीनी  पुलिस ने चरण-स्पर्श जाने पर रोक लगा रखी थी। सिर्फ आधा  कि.मी. तक जाने की परमिशन थी। मैं यात्रियों का अनुकरण करते हुए कैलाश-पर्वत की ओर चल दिए। आधे कि.मी. के बाद चीनी सैनिकों ने आगे बढ़ने से हमें रोक दिया।  उस पॉइंट पर कुछ यात्री पहले से ही बैठे कैलाश की तरफ मुँह कर के पूजा पाठ कर रहे थे। मैं भी वही बैठ गया और भोले बाबा का  ध्यान करने लगा। सामने कैलाश की छठा देखने वाली थी। ध्यान करते  हुए ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कैलाश से निकली हुई अदृश्य दिव्य  तरंगे शरीर को छू रही हों। ऐसी दिव्य शक्ति  का एहसास मुझे अपने जीवन में आज तक नहीं हुआ। मन ही मन मैंने बाबा भोले नाथ को नमन किया और वही आस पास घूमने लगा। हमारे एल.ओ साहिब भी वही थे। थोड़ी देर तक चीनी सैनिक चले गए। मैंने और एल.ओ साहिब ने आगे चरण स्पर्श तक जाने का निर्णय लिया और चरण स्पर्श की तरफ चल दिए। हम  कैलाश-पर्वत की ओर से बहकर आ रही जलधारा के किनारे-किनारे पहाड़ी पर चढ गए।

बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच से निकलते हुए हम आगे बढ़ते जा रहे थे। सिर्फ हम दो जन ही थे इस रास्ते में। चलते-चलते पानी की बोतल  समाप्त हो गई। गला सूखने लगा पर चरण-स्पर्श का कुछ पता नहीं। जितना आगे जाते उतना ही रास्ता और कठिन होता जा रहा था। शिलाओं पर कूदते-फांदते डर भी लग रहा था कि कहीं संतुलन न बिगड़ जाए, पर ’ऊँ नमःशिवाय’ का जाप करते बढ़ते जा रहे थे। हम आगे बढ़ते  रहे थे तभी हमारे पीछे से एक चीनी सैनिक और एक तिब्बती आदमी आते दिखाई दिए जब वो हमारे पास आ गए तो हमें वापिस चलने का इशारा करने लगे।  हम ने उन से रिक्वेस्ट की हमें आगे जाने दें लेकिन वो मान ही नहीं रहे थे।  आखिर हम दुखी मन से वापिस चल पड़े।  यहाँ से चरण स्पर्श लगभग आधा कि.मी था।  वापिस आ कर हम अपने कमरे में चले गए वहां जा कर पता चला हमारे कुछ यात्री हम से पहले चरण स्पर्श के दर्शन कर के आ चुके हैं।

शाम को बादल घिर रहे थे अँधेरे हो रहा था। थोड़ी देर बाद सूप आ गया फिर खाना खाया और सोने चले गए क्यों कि कल जल्दी उठना था कल का रास्ता इस यात्रा का सब से कठिन था।

कैलाश पर्वत और इस का महत्व
 
कैलाश पर्वत पर कैलाशपति सदाशिव विराजे हैं जिसके ऊपर स्वर्ग और नीचे मृत्यलोक है। कैलाश पर्वत जिसकी उँचाई 6740 मीटर है कुल 48 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।  कैलाश पर्वत की परिक्रमा वहां की सबसे निचली चोटी दारचेन से शुरू होकर सबसे ऊंची चोटी डेशफू गोम्पा पर पूरी होती है। यहां से कैलाश पर्वत को देखने पर ऐसा लगता है, मानों भगवान शिव स्वयं बर्फ से बने शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। इस चोटी को हिमरत्न भी कहा जाता है।  

यह अदभुत सौंदर्य वाला पर्वत है, तिब्बतियों  के लिए यह खांग रिम्पोचे (बर्फ का बहमुल्य रत्न) के रूप में जाना जाता है और वे इसे विश्व की नाभि के रूप में देखते हैं। तिब्बतियों के कवि संत मिलारेपा ने गुफा में ध्यान लगाते हुए यहाँ कई वर्ष बिताए थे। यह कहा जाता है कि इस पर्वत से एक धारा नज़दीक़ी झील में गिरती है और यहाँ से नदियाँ चार मुख्य दिशाओं में प्रवाहित होती हैं। उत्तर की और सिंह मुख नदी, पूर्व की और अश्व मुख नदी, दक्षिण की और मयूर मुख नदी तथा पश्चिम की ओर गज़ मुख नदी। यह काफ़ी आश्चर्या की बात है कि चार प्रमुख नदियाँ - सिंध, यर्लांग सोँपो(ब्रह्मपुत्र), करनाली एवम सतलुज का उद्गम वास्तव में कैलाश पर्वत के पास से होता है|

 
वैज्ञानिक मानते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप के चारों और पहले समुद्र होता था। इसके रशिया से टकराने से हिमालय का निर्माण हुआ। यह घटना अनुमानत:10 करोड़ वर्ष पूर्व घटी थी।

इस अलौकिक जगह पर प्रकाश तरंगों और ध्वनि तरंगों का अद्भुत समागम होता है, जो ‘ॐ’ की प्रतिध्वनि करता है। इस पावन स्थल को भारतीय दर्शन के हृदय की उपमा दी जाती है, जिसमें भारतीय सभ्यता की झलक प्रतिबिंबित होती है। कैलाश पर्वत की तलछटी में कल्पवृक्ष लगा हुआ है। कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व भाग को क्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण रूप में माना जाता है।
 
एक अन्य पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह जगह कुबेर की नगरी है। यहीं से महाविष्णु के करकमलों से निकलकर गंगा कैलाश पर्वत की चोटी पर गिरती है, जहां प्रभु शिव उन्हें अपनी जटाओं में भर धरती में निर्मल धारा के रूप में प्रवाहित करते हैं।
 
हालांकि कैलाश मानसरोवर से जुड़ें हजारों रहस्य पुराणों में भरे पड़े हैं। शिव पुराण, स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण आदि में कैलाश खंड नाम से अलग ही अध्याय है जहां कि महिमा का गुणगान किया गया है।  भारतीय दार्शनिकों और साधकों का यह प्रमुख स्थल है। यहां की जाने वाली तपस्या तुरंत ही मोक्ष प्रदान करने वाली होती है।


 
यम द्वार तक जाने का रास्ता 
 
यम द्वार के पास 
 
यम द्वार से कैलाश दर्शन 
 
मैं और बंसल जी यम द्वार के पास 
 
 
 
पोनी पोर्टर के इन्तजार में 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
परिक्रमा शुरू 
 

हमारा गाइड गुरु 
 
 
 
 
 
 
 
 
सामने नंदी जी के दर्शन 
 
 
 
 
डेरापुख से कैलाश दर्शन 
 
 
 
 
 
 

चरण स्पर्श से थोड़ा सा  पहले जहाँ हमें वापिस भेज दिया गया था। 
 
चरण स्पर्श जहाँ हमारे कुछ यात्रीगण गए थे यह फोटो मेरे मित्र प्रभु का है जो चरण स्पर्श तक जा कर आया था। 
 
चरण स्पर्श से पहले , ये फोटो भी मेरे दोस्त प्रभु द्वारा खींचा गया है। 
 


 
 



 

 
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