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Wednesday, 29 July 2015

कैलाश मानसरोवर यात्रा -----पाँचवाँ दिन -- अल्मोड़ा से मिर्थी, धारचूला --बस से = 220 KM


सुबह जल्दी ही आँख खुल गई।  गेस्ट हाऊस के कर्मचारियों द्वारा हमें  कमरे में ही चाय दी गयी। कमरे के बाहर भी हलचल सुनाई देने लगी थी। सभी यात्री तैयार हो कर चाय नाश्ता ले कर बस में बैठ गए।  शंकर भगवान का जयकारा और  हर-हर महादेव का घोष के साथ सभी यात्री निकल पड़े। 

सभी बाहर प्राकृतिक-छटा  निहारने में मगन थे। कुछ दूर चलने के बाद मेरी  तबीयत ख़राब होने लगी। दरअसल मैं पहाड़ो में बस से सफर  नहीं कर सकता।  मुझे ऐसे लगने लगा कि उल्टी अभी आएगी। लेकिन किसी तरह मैंने  अपने आप पर काबू रखा।  कुछ समय बाद बस  एक जगह रुकी। बस के रुकते ही मैं बाहर की तरफ भागा और साइड में जा कर उल्टी करने लगा। उल्टी  करने  के बाद सामने देखा बस तो गोलू देवता के मंदिर के पास खड़ी है।

जैसे ही हम मंदिर में प्रवेश करने लगे तो सामने एक बड़ा सा घंटा टंगा हुआ था। जैसे ही हम मंदिर के थोड़ा सा अंदर और गए तो चारो ओर घंटे ही घंटे टंगे हुए थे। हजारो की तादाद में बड़े से बड़े और छोटे छोटे घंटे टंगे हुए थे।  हम सब अपने अपने सिर को बचाते हुए मंदिर पहुंचे। सभी ने दर्शन-पूजा की और बाहर फोटोग्राफ़ी भी। यहाँ पर मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए एक अनोखा तरीका अपनाया जाता है मनोकामनाओं को कागज़ पर लिखा जाता है और फिर  घंटी के साथ बाँध दिया जाता है। 
 
गोलू देवता के बारे में 

गोलू देवता न्यायाधीश के रूप में पूजे जाते हैं।  भारत के उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले में स्थित चितई नामक स्थान में स्थित गोलू देवता का मंदिर अपने चमत्कारों के लिए सारे विश्व में प्रसिद्ध है। न्याय के देवता के रूप में प्रसिद्ध यह मंदिर हजारों घंटियों से ढका हुआ है। ये घंटियाँ लोग अपनी मनोकामना पूरी करने के बाद चढ़ाते हैं। कोर्ट में लंबित मुकदमों में जीत के लिए लोग यहाँ आ कर गुहार लगाते हैं और कहा जाता है कि गोलू देवता दूध का दूध और पानी का पानी कर देते हैं। 
जनश्रुतियों के अनुसार चम्पावत में कत्यूरी व बंशीराजा झालूराई का राज था। इनकी सात रानियां थी लेकिन वे नि:सन्तान थे। राजा ने भैरव पूजा का आयोजन किया। भगवान भैरव ने स्वप्न में कहा कि मैं तुम्हारे यहां आठवीं रानी से जन्म लूंगा।  एक दिन राजा शिकार करते हुए जंगल में बहुत दूर निकल गए। उन्हें प्यास लगी। दूर एक तालाब देखकर राजा ने ज्यों ही पानी को छुआ उन्हें एक नारी स्वर सुनाई दिया, 
'यह तालाब मेरा है। तुम बिना मेरी अनुमति के इसका जल नहीं पी सकते।' 
राजा ने उस नारी को अपना परिचय देते हुए कहा- मैं गढ़ी चम्पावत का राजा हूं। मैं आपका परिचय जानना चाहता हूं। तब उस नारी ने कहा- मैं पंच देव देवताओं की बहन कलिंगा हूं। राजा ने उसके साथ शादी की।रानी कलिंगा गर्भवती हुई। राजा प्रसन्न हुआ पर उसकी बाकी सात रानियों  को जलन हुई। रानी कलिंगा ने बालक को जन्म दिया पर सातों रानियों सिल बटटे को रानी कलिंगा को दिखाकर कहा कि तुमने उसे जन्म दिया है। बालक को एक लोहे के संदूक में लिटाकर काली नदी में बहा दिया। वह संदूक गोरीघाट में पहुंचा। गोरीघाट पर भाना नाम के मछुवारे के जाल में वह संदूक फँस गया। मछुवारा नि:संतान था, इसलिए उसने बालक को भगवान का प्रसाद मान कर पाल लिया। एक दिन बालक ने अपने असली माँ-बाप को सपने में देखा। उसने सपने की बात की सच्चाई का पता लगाने का निश्चय किया। एक दिन उस बालक ने अपने पालक पिता से कहा कि मुझे एक घोड़ा चाहये। निर्धन मछुवारा कहाँ से घोड़ा ला पाता। उसने एक बढ़ई से कहकर अपने पुत्र का मन रखने के लिए काठ का घोड़ा बनवा दिया। बालक चमत्कारी था।  उसने उस काठ के घोड़े में प्राण डाल दिये और फिर वह उस घोड़े में बैठकर दूर-दूर तक घूमने जाने लगा। एक बार घूमते-घूमते वह राजा झालूराई की राजधारी धूमाकोट में पहुँचा।  घोड़े को एक जलाशय के पास बांधकर सुस्ताने लगा। वह जलाशय रानियों का स्नानागार भी था। सातों रानियां आपस में बातचीत कर रही थीं और रानी कलिंगा के साथ किए गए अपने कुकृत्यों का बखान कर रहीं थी कि बालक को मारने में किसने कितना सहयोग दिया और कलिंगा को सिलबट्टा दिखाने तक का पूरा हाल एक दूसरे को बढ़ चढ़ कर सुना रही थी। उनकी बात सुनकर, बालक को अपना सपना सच लगने लगा। वह अपने काठ के घोड़े को लेकर जलाशय के पास गया और रानियों से कहने लगा,
'पीछे हटिये- पीछे हटिये, मेरे घोड़े को पानी पीना है।'
सातों रानियां उसकी बेवकूफी भरी बातों पर हँसने लगी और बोली, 'कैसे  बेवकूफ हो। कहीं काठ का घोड़ा पानी भी पी सकता है।'
 
बालक ने तुरन्त पूछा,
'क्या कोई स्त्री पत्थर (सिल-बट्टे) को जन्म दे सकती है?'
सभी सातों रानियों डर गयी और राजमहल जा कर राजा से उस बालक की झूठी शिकायतें करने लगी। राजा ने बालक को पकड़वा कर पूछा,'यह क्या पागलपन है तुम एक काठ के घोड़े को कैसे पानी पिला सकते हो?'
 
बालक ने उत्तर दिया, महाराज यदि आपकी रानी सिलबट्टा (पत्थर) पैदा कर सकती है, तो यह काठ का घोड़ा भी पानी पी सकता है।' उसके बाद उसने अपने जन्म की घटनाओं का पूरा वर्णन राजा के सामने किया और कहा, 'न केवल मेरी मां कलिंगा के साथ अन्याय हुआ है पर महराज आप भी ठगे गए हैं।'राजा ने सातों रानियों को बंदीगृह में डाल देने की आज्ञा दी। सातों रानियां रानी कलिंगा से अपने किए की क्षमा मांगने लगी और रोने गिड़गिड़ाने लगीं। तब उस बालक ने अपने पिता को समझाकर उन्हें माफ कर देने का अनुरोध किया। राजा ने उन्हें दासियों की भाँति जीवन-यापन करने के लिए छोड़ दिया।  कहा जाता है कि यही बालक बड़ा होकर ग्वेल, गोलू बाला, गोरिया, तथा गौर -भैरव नाम से प्रसिद्व हुआ है। ग्वेल नाम इसलिए पड़ा कि उन्होंने अपने राज्य में जनता की एक रक्षक के रूप में रक्षा की। आप गोरी घाट में एक मछुवारे को संदूक में मिले, इसलिए बाला गोरिया कहलाए। भैरव रूप में इन्हें शक्तियाँ प्राप्त थी। आप गोरे थे इसलिए इन्हें गौर भैरव भी कहा गया। 

 
इस के बाद सब यात्री बस में बैठ गए। आगे चल कर बस धौलछीना में एक रेस्टोरेंट में नाश्ते का प्रवन्ध था। सभी यात्रियों ने यहाँ पर नाश्ते का आनंद लिया। बस चलने से पहले सभी ने कुछ चित्र लिए। 
अब हमारी अगली मंजिल यहाँ से 119 km दूर डीडीहाटमें कुमाऊँ-मंडल का गेस्ट-हाऊस था। दोपहर का भोजन वही था। सभी यात्री यात्रा का आनंद लेने में मग्न थे। हम दोपहर तक डीडीहाट के कुमाऊँ-मंडल के  गेस्ट-हाऊस पहुँच गए। 
 
डीडीहाट के बारे में

पिथौरागढ़ जिले में स्थित डीडीहाट एक शांत पर्यटन स्थल है। यह एक नगर पंचायत है यह समुद्र तल से 1750  मीटर की ऊंचाई पर ‘डिग्टड़’ नामक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। इस जगह का नाम कुमाऊंनी शब्द ‘डंड' से लिया गया है, जिसका मतलब एक छोटी सी पहाड़ी से है। नीचे चरमगढ़ व भदीगढ़ नदियां बहती हैं।  
 
यहाँ पर सभी यात्रियों  का स्वागत  बहुत सुंदर बच्चों ने किया। यहाँ पर सभी यात्रियों ने जलपान किया और अगले पड़ाव 5 km दूर मिर्थी आई.टी.बी.पी कैंप की और चल पड़े। थोड़ा सा आगे जाने पर हमारी बस के आगे आई.टी.बी.पी की पायलट जिप्सी चल पड़ी। जो हमें मिर्थी के आई.टी.बी.पी कैंप में ले गई। जैसे ही हम बस से उतरे तो हम ने देखा बैंड-बाजे बज रहे थे। स्थानीय लोक-कलाकार परंपरागत वेशभूषा में छलिया-नृत्य करते हुए चल रहे थे। हमारे कुछ यात्री भी इस नृत्य में शामिल हो गए। यहाँ पर आई.टी.बी.पी. के जवानों ने बड़ी गर्मजोशी के साथ  हमारा स्वागत किया। इस प्रकार का स्वागत देख कर ऐसा महसूस हुआ जैसे हम कोई V.I.P हों। आगे जाकर मुख्य स्वागत-कर्ता आई.टी.बी.पी. के कमांडर  दल के स्वागत में खड़े थे। उन्होंने एल.ओ को पुष्प भेंट किए। वही पर एक शिवजी के मंदिर में सभी नतमस्तक हुए।
 
इसके बाद हमें ग्रुप फोटो के लिए एक स्थान पर ले जाया गया। फोटो लेने के लिए सीट नामांकित-पर्ची चिपकी हुई पहले से ही निश्चित थीं, सभी अपने निर्धारित स्थान पर बैठ गए और फोटो खिचवाया। तत्पश्तात सभी को जलपान हेतु बड़े कक्ष में ले जाया गया जहाँ पर बड़े ही अच्छे ढंग से जलपान  लगाया हुआ था। सभी यात्रियों ने जलपान का आनंद लिया। जलपान के बाद संबोधन कक्ष में ले जाया गया। जहाँ चारों कुछ सोफ़े और कुर्सियाँ लगीं थीं। सब बैठ गए। जहां पर हमें कमाण्डेंट द्वारा आगे के दुर्गम पहाड़ी रास्ते मौसम, जलवायु, ठण्ड तथा इन सबके लिए सावधानियों के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई। अंत में एल.ओ ने अति संक्षिप्त रुप में धन्यवाद देते हुए समस्त-दल की ओर से उनके सुझावों को मानने का वायदा किया और विदाई ली।  विदाई भी तो अति भावपूर्ण थी। फौजी बैंड की धुन बजाकर भेजा जा रहा था। हम सब गौरवान्वित अनुभव कर रहे थे। उन सब के प्रति आभार मान रहे थे। सच में यह स्वागत यात्रा के उत्साह को  बढ़ाने वाला तथा  कभी भी न भुलाया जा सकने वाला था।

सभी यात्री भोले नाथ के जयकारों के साथ अपनी अगली मंज़िल धारचूला जोकि यहाँ से 56 KM दूर था चल पड़े। मिरथी से धारचूला नीचे ढलान पर है सो बस तेजी से दौड़ रही थी। शाम को  हम धारचूला के कुमाऊं-मंडल विकास निगम के गेस्ट-हाऊस में प्रवेश कर गए।
 
प्रवेश करते ही रिसेप्शन था जहाँ पर यात्री फनी कुमार ने  सभी को कमरा नंबर  और सहयात्री बता दिए। सभी अपने कमरे की चाबी लेकर चल दिए।  यहाँ पर स्टेट बैंक ऑफ़ पटियाला की तरफ से यात्रियों के स्वागत में बैनर लगाये हुए थे।  साथ में उन्होंने हमारे सहयात्री चौबल जी (जो मुंबई से हैं) और स्टेट बैंक ऑफ़ पटियाला में थे उनके स्वागत के लिए उनके नाम से भी बैनर लगाये हुए थे। गेस्ट हाउस के कमरे बहुत बड़े थे, साफ़-सुंदर, अटैच बाथरुम और टीवी लगा हुआ था। सामने दो खिड़की थी और खिड़की से बाहर छोटी सी अर्धगोलाकार बालकनी थी।  खिड़की खोलने पर सामने का नजारा देखने वाला था।  सामने काली नदी पूर्ण वेग और ध्वनि के साथ दौड़ रही थी और काली नदी के दूसरी तरफ नेपाल था। नीचे अब हमारा लगेज भी आगया है। रिशेप्शन पर बने बड़े कक्ष में ही सबके एक जैसे सफेद बोरे फैले हुए थे। सब बोरे पर अपना-अपना नाम ढूंढ रहे थे। मैं अपना लगेज ढूंढकर अपने कमरे में ले आया। मेरे साथ कमरे में दिनेश बांसल जी और चैना  राम जी थे।

बाथरुम में गर्म पानी आ रहा था। हाथ-मुंह धोकर तरो-ताजा हो कर हम काली नदी के दूसरी तरफ नेपाल घूमने निकल पड़े।  नदी में हेंगिंग ब्रिज बना हुआ है। जिसमें से लोग बिना किसी रोक टोक के आना जाना करते हैं किन्तु हमें बताया गया कि शाम 7.00 बजे के बाद आना-जाना बंद कर दिया जाता है। हम 5 -6 जन नेपाल साइड ब्रिज पार कर के नेपाल साइड घूम कर वापिस आ गए। 

कल के कर्यक्रम के अनुसार हमें  बताया गया  कि सभी यात्री अपना सामान ऐसे  तैयार करें कि सामान का वजन प्रति यात्री 20 किलो से अधिक न हो, चूंकि कल से पैदल यात्रा शुरू होनी है अत: जिन यात्री को पोनी एवं पोर्टर चाहिए वे आज यही बता दे ताकि कल उन्हें मंगती में वह सुविधा उपलब्ध कराया जा सकेगा। पोनी की दर लगभग 11000 /- आने जाने का और पोर्टर की दर लगभग 9000 /- आने जाने का था।  कु.मं.वि.नि. का निर्धारित ठेकेदार पंजीकरण-शुल्क ले कर रसीद दे देगा। एक तरफ़ की  राशि भारत तिब्बत बॉर्डर पार करते समय दी जाएगी। पूर्ण भुगतान वापिस  आने पर होगा।कुछ यात्रियों ने बिना पोनी/पोर्टर के ही यात्रा करना तय किया, कुछ के द्वारा केवल पोर्टर की मांग बताई गई तथा कुछ लोगों के द्वारा पोनी एवं पोर्टर दोनों की मांग नोट कराई गई। मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं पोनी और पोर्टर  करू या ना करू। मैं सोचता रहा और बाकी यात्रियों की बात सुनता रहा। लेकिन कुछ decide नहीं कर पाया। 

गाला में (अगला रात्रि विश्राम) लगेज नहीं मिलेगा। एक जोड़ी कपड़े साथ वाले बैग में रखें। फालतू सामान यहीं छोड़ा जा सकता है। आने पर वापिस मिल जाएगा। अधिक सामान न ले जाएं। अगले दिन सुबहे 8 बजे निकलना था, पुनः पैकिंग करके भगवान का नाम लिया और निद्रा समाधि में चले गए। 

इस यात्रा को आरम्भ से पढने के लिये यहाँ क्लिक करें। 


गोलू देवता मंदिर 

मंदिर के प्रवेश द्वार पर घंटियां 


गोलू देवता 



डीडीहाट में सुन्दर बच्चों द्वारा स्वागत 

बस के आगे चलती पायलट जिप्सी 

मिर्थी में स्वागत 










धारचूला में गेस्ट हाउस 


कमरे की खिड़की से बाहर का नजारा 
 
काली नदी के दूसरी तरफ नेपाल को जोड़ता पूल 
 


नेपाल में घूमते हुए फनी कुमार, श्रुति,अनिरुद्ध,प्रभु,दिनेश बंसल जी। 


धारचूला में बने मकान 
 













 
 

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